विपिन जोशी ..
समता और संवैधानिक नैतिकता का आह्वान
दीपशिखा से प्रज्वलित हुआ समता का संकल्प
कोट भ्रामरी के पावन प्रांगण में ‘समता सद्भावना मंच’ के तत्वावधान में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पूरी वैचारिक गरिमा के साथ मनाई गई। समारोह का आगाज पद्मश्री राधा भट्ट, उत्तरकाशी से आए सर्वोदयी सुरेश भाई, नगर पंचायत अध्यक्ष भावना वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा और इंद्रेश मैखुरी सहित अन्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।
कार्यक्रम का कुशल संचालन रवि बिष्ट ने किया, जबकि भुवन पाठक और किशोर कुमार ने बाबा साहब के जीवन दर्शन और आज के दौर में उनकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए समारोह की भूमिका साझा की।

वैचारिक विमर्श: मुखर वाणी के मुख्य अंश
समारोह में बौद्धिक विमर्श का केंद्र ‘संवैधानिक नैतिकता’ और ‘सामाजिक न्याय’ रहा। वक्ताओं ने न केवल बाबा साहब को याद किया, बल्कि वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर भी तीखे प्रहार किए:
इंद्रेश मैखुरी (प्रवक्ता, भाकपा माले): बाबा साहब के 1948 के ऐतिहासिक भाषण को उद्धृत करते हुए सचेत किया कि “बिना संविधान बदले भी संविधान को खत्म किया जा सकता है।” उन्होंने जोर दिया कि समता तभी आएगी जब शासक और शासित का भेद मिटेगा और संवैधानिक नैतिकता को समाज के आचरण में उतारा जाएगा।
राजीव नयन बहुगुणा (वरिष्ठ पत्रकार): उन्होंने गांधी और अंबेडकर के बीच के कृत्रिम विरोध को खारिज करते हुए कहा कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। बाबा साहब केवल दलितों के मसीहा नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए समता के पुंज थे।
विपिन नौटियाल (अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट): महिला सम्मान और ‘वेलफेयर स्टेट’ (कल्याणकारी राज्य) की अवधारणा पर बात की। उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया कि आज समाज में समतामूलक समाज का बिंब धुंधला पड़ता जा रहा है।
सुरेश भाई (वरिष्ठ सर्वोदयी कार्यकर्ता): उन्होंने राजनीति के दोहरेपन पर प्रहार करते हुए कहा कि नेता भाषणों में तो अंबेडकर और गांधी का नाम लेते हैं, लेकिन यथार्थ में देश में समता का अभाव है। गांव में जाकर देखिए असमानता किस कदर व्याप्त है ।
पद्मश्री राधा भट्ट का नागरिक सम्मान और कड़वा सच –
समारोह का सबसे भावुक और प्रेरणादायी क्षण 95 वर्षीय पद्मश्री राधा भट्ट का नागरिक अभिनंदन रहा। अपने संबोधन में उन्होंने व्यवस्था को आईना दिखाते हुए कहा:
जब तक देश में ‘मॉब लिंचिंग’ जैसी घटनाएं होती रहेंगी, तब तक गांधी और अंबेडकर का नाम लेना बेमानी है। यदि हम अन्याय का प्रतिकार नहीं कर सकते, तो हमारे आयोजन खोखले हैं।” सरकारी आयोजन अब मात्र दिखावा बन कर रह गए हैं इसलिए विचारो को गुलदस्ता बनाने से अच्छा है उनको जीवन में उतारा भी जाए।

समारोह में वैचारिक विविधता के बावजूद ‘समानता’ के लक्ष्य पर सभी एकमत दिखे। इस अवसर पर पी.सी. तिवारी, दर्जा मंत्री शिव सिंह बिष्ट, पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण, प्रदीप टम्टा, प्रो. डी.एन. तिवारी, इंद्रेश मैखुरी, राजीव नयन बहुगुणा, विपिन नौटियाल, राधा भट्ट, हर्ष काफ़र, सुरेश भाई, ईश्वर जोशी, भावना वर्मा , प्रो डी एन तिवारी डिग्री कॉलेज गरुड़, मोहन जोशी, भुवन पाठक, हरीश जोशी, डी के जोशी, गिरीश तिवारी, गोपाल राम, लक्ष्मण आर्या, प्रकाश कोहली। सहित भारी संख्या में गणमान्य नागरिक, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

यह समारोह केवल एक जयंती उत्सव नहीं, बल्कि वर्तमान समय में लुप्त होती जा रही संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक समरसता को पुनः जीवित करने का एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुआ।


















