विपिन जोशी …
उत्तराखंड की पहाड़ी अस्मिता और जन-अधिकारों के प्रति सरकार की बेरुखी के खिलाफ अब कांडा की घाटी से विद्रोह का बिगुल फूंक दिया गया है। 21 दिनों से जारी यह आंदोलन अब केवल एक मांग नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्वाभिमान की ‘महातपस्या’ बन चुका है।
हक की हुंकार: 1956 से ठगा गया कांडा, अब आर-पार की जंग को है तैयार.
कांडा/बागेश्वर: जब व्यवस्था जनभावनाओं को कुचलने लगती है, तो देवभूमि की शांत वादियां भी इंकलाब के नारों से गूंज उठती हैं। कांडा को पृथक विकासखंड बनाने की मांग अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। पृथक विकासखंड संघर्ष समिति’ के बैनर तले जारी क्रमिक अनशन 21 वें दिन में प्रवेश कर गया है। यह लड़ाई सिर्फ एक प्रशासनिक इकाई की नहीं, बल्कि उस धोखे के खिलाफ है जो 1956 से यहाँ की जनता के साथ किया जा रहा है।

आस्था का आशीर्वाद: मंदिर के पुजारियों ने संभाला मोर्चा
आंदोलन को अब दैवीय और नैतिक बल भी मिल गया है। रविवार को कांडा कालिका मंदिर के पुजारी बबलू कांडपाल और घटबड़िया गोलू मंदिर के पुजारी भास्कर जोशी स्वयं ‘महातपस्या’ पर बैठ गए हैं। मंदिर के प्रांगण से उठी यह आवाज इस बात का प्रतीक है कि अब समाज का हर वर्ग व्यवस्था के इस सौतेले व्यवहार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।
सियासी गलियारों में हलचल: UKD का खुला समर्थन
उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के आधार स्तंभ उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) ने इस आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन दे दिया है। दल के केंद्रीय कोषाध्यक्ष वरुण चंदोला सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने धरना स्थल पर पहुंचकर स्पष्ट किया कि कांडा की यह मांग जायज है इसे दबाया नहीं जा सकता।
वक्ताओं ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि:
“जो विकासखंड 1956 में कांडा में संचालित था, उसे एक सोची-समझी साजिश के तहत बागेश्वर मुख्यालय स्थानांतरित कर दिया गया। आज कांडा, कमस्यार और दुगनाकुरी के दूरस्थ गांवों के ग्रामीणों को एक छोटे से काम के लिए पूरा दिन और गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद कर मुख्यालय भागना पड़ता है। यह अन्याय अब बर्दाश्त नहीं होगा।”
संघर्ष समिति ने अब कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। क्षेत्र की युवा पीढ़ी को इस धर्मयुद्ध में शामिल होने का आह्वान करते हुए संघर्ष समिति ने उन लोगों को स्पष्ट चेतावनी दी है जो निजी स्वार्थवश इस आंदोलन से दूरी बनाए हुए हैं। समिति ने निर्णय लिया है कि जो लोग इस संघर्ष में जनभावनाओं के साथ नहीं हैं, उन्हें आगामी पंचायत चुनाव सहित किसी भी चुनाव में समर्थन नहीं दिया जाएगा। क्षेत्र की जनता ऐसे जन-विरोधियों का पूर्ण सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार करेगी।
संघर्ष समिति के अध्यक्ष गोविंद सिंह भंडारी की अध्यक्षता में हुई बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ कि अब कोरे आश्वासनों का दौर खत्म हो चुका है। जब तक मुख्यमंत्री की ओर से पृथक विकासखंड की लिखित घोषणा नहीं मिल जाती, तब तक कांडा की धरती पर यह सत्याग्रह जारी रहेगा।
कोषाध्यक्ष राजेंद्र गैढ़ा ने आंदोलन को गति देने के लिए आर्थिक सहयोग की अपील की है, ताकि संसाधनों के अभाव में जनता की आवाज कमजोर न पड़े। इस मौके पर सैकड़ों की संख्या में मौजूद मातृशक्ति, युवाओं और बुजुर्गों ने एक स्वर में कहा “कांडा का हक, कांडा को दो!
बैठक में रूप सिंह माजिला, भगवान सिंह धपोला, सुरेश रावत, आलम मेहरा सहित क्षेत्र के दर्जनों गणमान्य व्यक्ति और आंदोलनकारी उपस्थित रहे।


















