विपिन जोशी
शराब ठेके के विरोध के बीच समर्थन में भी नारेबाजी: कपकोट में स्थिति तनावपूर्ण
उत्तराखंड के कपकोट क्षेत्र के शामा गाँव में शराब की दुकान को लेकर जनमत दो हिस्सों में बंट गया है। जहाँ एक ओर ग्रामीण और महिलाएँ दुकान बंद करने के लिए आंदोलनरत हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग दुकान के समर्थन में उतर आए हैं।

विरोध में भूख हड़ताल जारी
शामा में शराब की दुकान के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले चार दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे नंदन सिंह की बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्हें जूस पिलाकर अनशन से उठाया गया। उनके स्थान पर अब जिला पंचायत सदस्य विजया कोरंगा अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गई हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होती, आंदोलन जारी रहेगा। भूख हड़ताल के कारण नंदन सिंह का वजन लगभग 5 किलो कम हो गया है, जिससे क्षेत्र में चिंता बनी हुई है। संघर्ष समिति का दावा है कि उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है।
समर्थन में गूंजे नारे, वीडियो हुआ वायरल
इसी बीच, गुरुवार को एक नया मोड़ तब आया जब कुछ लोग शराब की दुकान के समर्थन में उतर आए। दुकान के बाहर खड़े होकर इन लोगों ने नारेबाजी की, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। समर्थन करने वालों का तर्क है कि:
* शराब का उत्पादन उत्तराखंड में नहीं होता, यह बाहर से आती है।
* यदि पूरे प्रदेश में शराब बंद हुई तो राज्य की आर्थिक व्यवस्था चरमरा जाएगी।
* शराब की बिक्री से मिलने वाले टैक्स से ही क्षेत्र का विकास होता है।
आमने-सामने की स्थिति
समर्थन में नारेबाजी करने वालों में हीरा सिंह कोरंगा, इंद्र सिंह, दर्शन सिंह और तारा सिंह सहित कई अन्य लोग शामिल रहे। जहाँ एक तरफ पहाड़ की महिलाएँ 15-20 किलोमीटर पैदल चलकर नशामुक्ति के लिए जागरूकता फैला रही हैं, वहीं दूसरी तरफ ‘विकास और टैक्स’ के नाम पर शराब का समर्थन करने वालों ने इस विवाद को ‘आमने-सामने’ की लड़ाई बना दिया है।
अब सवाल उठने लगे हैं – पहाड़ की शांत वादियों में अब हवाएँ सिर्फ़ साफ़ नहीं रही, बल्कि वे एक नए प्रकार के ‘नशीले विकास’ की सुगंध से भी भर गई हैं। एक तरफ़, भूख हड़ताल पर बैठी महिलाओं का एक समूह है, जो शायद विकास का मतलब बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे को समझता है। उनकी ज़िद है कि शराब की दुकान बंद हो। लेकिन वे नहीं जानतीं कि ‘असली’ विकास क्या है!
दूसरी तरफ़, कुछ ‘जागरूक’ नागरिकों का समूह है, जो विकास के असली मतलब को पहचानते हैं। उनके लिए, विकास का मतलब एक दुकान से मिलने वाला टैक्स राजस्व है, चाहे वह समाज के लिए कितना भी विनाशकारी क्यों न हो। उनके नारे गूंजते हैं: “नहीं हटेगी, नहीं हटेगी! शराब की दुकान नहीं हटेगी!” और “टैक्स से हमारा विकास होता है!” वाह, क्या ‘तर्क’ है! अगर समाज बर्बाद हो रहा है, तो कोई बात नहीं, कम से कम सरकार के खजाने में ‘तरल सोना’ तो आ रहा है।
प्रशासन को अब इस मामले में जल्द हस्तक्षेप करने और कार्ययोजना प्रस्तुत करने की चुनौती है, क्योंकि आंदोलनकारी किसी भी स्थिति में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।


















