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नदी में बहती संवेदना और दम तोड़ता विज्ञान

आस्था की धारा में बहती संवेदना और दम तोड़ता विज्ञान
समसामयिक विश्लेषण: विपिन जोशी
नर्मदा के तट पर मंत्रोच्चार हो रहे थे, शंख बज रहे थे और ग्यारह हजार लीटर सफेद, शुद्ध दूध पवित्र धारा में विसर्जित किया जा रहा था। किनारे खड़ी भीड़ इसे ‘महा-अनुष्ठान’ कह रही थी, सोशल मीडिया इसे ‘परंपरा’ बता रहा था, लेकिन क्या किसी ने उस दूध की धार में दम तोड़ते जलीय जीवन और इतिहास के पन्नों में सिसकते ‘अश्वत्थामा’ को देखा?
यह घटना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी आधुनिक व्यवस्था, अंधी आस्था और वैज्ञानिक समझ के बीच के गहरे द्वंद्व का प्रतिबिंब है।
इतिहास का दोहराव: धृतराष्ट्र की सत्ता और अश्वत्थामा का कटोरा
हस्तिनापुर का वह काल याद कीजिए, जहाँ धृतराष्ट्र सत्ता के केंद्र में थे। आँखें नहीं थीं, इसलिए दृश्य गौण थे और मोह प्रधान। उस दौर में भी दूध संपन्नता का प्रतीक था। कौरवों के महलों में दूध की नदियाँ बहती थीं, लेकिन उसी राज्य में गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा दूध के लिए तरसता था।

गरीब मां ने जब आटे को पानी में घोलकर उसे ‘गोरस’ (दूध) कहकर पिलाया, तब आस्था जीत गई थी और व्यवस्था हार गई थी। आज नर्मदा के तट पर भी वही दृश्य दोहराया गया। ग्यारह हजार लीटर दूध नदी में बहा दिया गया, जबकि देश के न जाने कितने आंगन आज भी ‘आटे के घोल’ से बच्चों को बहला रहे हैं। जब सत्ता और समाज ‘धृतराष्ट्र’ बन जाते हैं, तब उन्हें संसाधनों की बर्बादी धर्म नजर आती है और अभाव में जी रहा समाज महज एक आँकड़ा।
सफेद जहर: दूध का वैज्ञानिक पक्ष
जिसे हम ‘पावन अर्पण’ कह रहे हैं, विज्ञान की भाषा में वह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सफेद जहर है। दूध प्राकृतिक है, लेकिन पानी के लिए यह एक ‘जैविक प्रदूषक’ (Organic Pollutant) की तरह काम करता है।
ऑक्सीजन की चोरी: दूध में मौजूद वसा और शर्करा को तोड़ने के लिए बैक्टीरिया पानी की पूरी ऑक्सीजन सोख लेते हैं। इसे विज्ञान की भाषा में BOD (Biochemical Oxygen Demand) का बढ़ना कहते हैं। परिणाम? मछलियाँ और अन्य जलीय जीव पानी के भीतर ही दम घुटने से मर जाते हैं।
अमोनिया का संकट: दूध का प्रोटीन जब पानी में सड़ता है, तो अमोनिया पैदा करता है, जो मछलियों के गलफड़ों को जला देता है।
अंधेरी गहराई: दूध पानी को धुंधला कर देता है, जिससे सूरज की रोशनी नीचे मौजूद पौधों तक नहीं पहुँच पाती। बिना रोशनी के पौधे ऑक्सीजन बनाना बंद कर देते हैं—यह एक चक्र है जो जीवन को खत्म कर देता है।
विद्रूपता: आशीर्वाद बनाम प्रदर्शन
हमारे पूर्वजों ने ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’ का आशीर्वाद दिया था ताकि घर में संपन्नता रहे, न कि इसलिए कि हम दूध को नालियों या नदियों में बहाकर प्रदर्शन करें। जब ग्यारह हजार लीटर दूध बहता है, तो वह केवल तरल पदार्थ नहीं, बल्कि समाज की मर चुकी संवेदना का आईना होता है।
प्रशासन मूकदर्शक बना रहा, क्योंकि उसके सामने ‘आस्था’ का कवच था। पर्यावरण की दुहाई देने वाले मौन रहे, क्योंकि मामला ‘धार्मिक’ था। लेकिन क्या अधर्म केवल वह है जो शास्त्रों में लिखा है? नदी को ‘माँ’ कहना और फिर उसी के गले में दूध के जरिए ऑक्सीजन का फंदा डालना, क्या यह अधर्म नहीं है?
निष्कर्ष: कहाँ है असली धर्म?
असली धर्म नदी में बहाए गए दूध में नहीं, बल्कि उस भूखे बच्चे के कटोरे में है जिसे आज भी शुद्ध दूध नसीब नहीं। धर्म जलीय जीवों की रक्षा में है, न कि उनके प्राण हरने वाले अनुष्ठानों में।
इस बात को भी समझने की जरूरत है कि भले ही दूध बहते पानी में डाला जाए, लेकिन यदि इसकी मात्रा अधिक है, तो यह निश्चित रूप से सड़ जाएगा. यह पानी में ऑक्सीजन को खत्म कर देगा और सड़ांध पैदा करेगा, जिससे जलीय जीवन के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं. इसलिए, दूध को सीधे नदी या किसी भी जल निकाय में बहाना एक गंभीर पर्यावरणीय खतरा है,
अगर हम आज भी धृतराष्ट्र की तरह आँखें बंद किए बैठे रहे, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। नर्मदा की लहरों में बहता वह ग्यारह हजार लीटर दूध चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि “आस्था तभी तक पवित्र है, जब तक वह जीवन की रक्षा करे, न कि जीवन का अंत।”
वक़्त आ गया है कि हम अपनी आस्था को वैज्ञानिक चेतना और मानवीय संवेदना के साथ जोड़ें, वरना हम ऐसे ‘हस्तिनापुर’ की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ उत्सव तो होंगे, लेकिन संवेदनाएँ मर चुकी होंगी।
स्रोत-विभिन्न डिजिटल पब्लिश आर्टिकल

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