Day: April 13, 2026

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    नदी में बहती संवेदना और दम तोड़ता विज्ञान

    नर्मदा के तट पर मंत्रोच्चार हो रहे थे, शंख बज रहे थे और ग्यारह हजार लीटर सफेद, शुद्ध दूध पवित्र धारा में विसर्जित किया जा रहा था। किनारे खड़ी भीड़ इसे ‘महा-अनुष्ठान’ कह रही थी, सोशल मीडिया इसे ‘परंपरा’ बता रहा था, लेकिन क्या किसी ने उस दूध की धार में दम तोड़ते जलीय जीवन और इतिहास के पन्नों में सिसकते ‘अश्वत्थामा’ को देखा?
    यह घटना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी आधुनिक व्यवस्था, अंधी आस्था और वैज्ञानिक समझ के बीच के गहरे द्वंद्व का प्रतिबिंब है।
    इतिहास का दोहराव: धृतराष्ट्र की सत्ता और अश्वत्थामा का कटोरा
    हस्तिनापुर का वह काल याद कीजिए, जहाँ धृतराष्ट्र सत्ता के केंद्र में थे। आँखें नहीं थीं, इसलिए दृश्य गौण थे और मोह प्रधान। उस दौर में भी दूध संपन्नता का प्रतीक था। कौरवों के महलों में दूध की नदियाँ बहती थीं, लेकिन उसी राज्य में गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा दूध के लिए तरसता था।