बदलाव : हल बैल से थ्रेसर तक

विपिन जोशी, उत्तराखंड
मई 2024 , पहाड़ के घाटी वाले क्षेत्रों में गेहॅू मणाई का काम लगभग पूरा चुका है। धान का बिनौड़ा यानी बीज रख दिया गया है। अब जून और जुलाई में विस्तार लेते सेरों में धान रोपाई का सीजन चलेगा। खेती-किसानी के लिए उत्तराखण्ड बागेश्वर की कत्यूर घाटी बहुत उपजाउ मानी जाती है। इस घाटी को धान का कटोरा भी कहा जाता है। मुख्य फसल के रूप में धान, गेहॅू, आलू प्रमुख है जो अभी भी बहुसंख्यक आबादी के लिए भरण-पोषण का प्रमुख माध्यम है। समय के साथ प्रकृति में कई सारे बदलाव आते हैं। जलवायु परिवर्तन हो या नदियों की स्थिति अथवा वनों की स्थिति ये बदलाव हमें प्रत्यक्ष तौर पर लेकिन दीर्घकालिक समयावधि में महसूस होते हैं। परन्तु कुछ परिर्वतन हमें त्वरित तौर पर दिखते हैं जिनको हम एक या दो दशक के अंतर में महसूस करते हैं और उनको अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंग भी बना लेते हैं। भौतिक बदलाव के इस क्रम में खेती-किसानी को यदि देखें तो पाएंगे कि पहाड़ की घाटियों में जहां सड़कों का जाल बिछ गया है खेती करने के तौर तरीके भी बदल गए। खेती में होने वाले प्रमुख बदलावों में सबसे प्राथमिक घटक है पशुधन। बिना पशुधन उसमें भी बैल के बिना एक दौर में खेती करना संभव नहीं था। हल और बैल किसान के साथी हुआ करते थे। इनसे जुड़े थे कृषि यंत्र बनाने वालों के छोटे काम धंधे और इन्हीं से जुड़ी थी कृषि लोक गायन विधा हुड़की बौल की परंपरा जो पहाड़ की कृषि में आपसी सहयोग और एकता को दर्शाती थी। लेकिन बदलाव की बयार में सबसे पहला झटका बैलों को लगा और पारंपरिक खेती-बाड़ी की सूरत ही बदल गई। बैलों का स्थान लिया छोटे ट्रिलर ने साथ में गेहॅू मणाई की थ्रेसर मशीन भी आ गई।

मशीन के आने से महिलाओं का कार्य बोझ बहुत कम हुआ तो समय की बचत भी होने लगी। सुविधा आई और अब खेती किसानी के लिए बहुत ज्यादा आर-सार या सहयोग की जरूरत नहीं पड़ती। बैल खास और चारा खाते थे तो मशीनें तेल और बिजली पीती हैं साथ में तकनीक का जादू दिखाते हुए सबको मोह लेती हैं। लेकिन सिर्फ सुविधा या समय की बचत को मध्येनजर रखते हुए खुश नहीं होना चाहिए। पारंपरिक कृषि परंपरा में हल बैल से जोते खेतों में उत्पादन अधिक होता था और रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं का प्रयोग भी कम होता था। नए तौर तरीकों ने किसान को सुविधा बेशक दी हो लेकिन मशीनीकरण की खेती ने उत्पादन को अवश्य प्रभावित किया और बहुत से पारंपरिक कारीगर बेरोजगार हो गए। हल बैल की परंपरा खत्म हुई तो कृषि से जुड़ा स्थानीय बाजार भी प्रभावित हुआ। इसका दूरगामी असर बहुत संतोषतनक नहीं हो सकता। अब खेतो में संगीतमयी गायन से जुड़ी हुड़की बौल विधा नहीं दिखती हर तरफ छोटे ट्रिलरों का शोर रहता है। थ्रेसर से निकलने वाली डस्ट वातावरण में घुलती है और किसानी से सामूहिकता भी कहीं दूर छिटकती चली जाती है। खेत जोतने वाले बचे-खुचे बैल अब सड़कों में आवारा फिरते हैं, सब्जी की दुकानों में आक्रमण करते हैं और यातायात को प्रभावित करते हैं। साथ में मशीनीकरण से फलती-फूलती खेती को बैल अब सड़कों से निहारते हैं, और करें भी क्या बैलों का रोजगार तो छीन लिया मशीनीकरण ने।

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