छोटी सी उम्र में पर्यावरण संरक्षण का बड़ा संदेश
विपिन जोशी…
पर्यावरण सरंक्षण का नन्हा सिपाही: 7 साल के गोलू ने रोप दिए 600 पौधे
बागेश्वर जिले के गरुड़ ब्लॉक अंतर्गत मजकोट निवासी 7 वर्षीय गोलू पुरी ने अपने जन्मदिन को यादगार बनाते हुए पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी मिसाल पेश की है। राजकीय प्राथमिक विद्यालय मजकोट में कक्षा 2 के छात्र गोलू ने अपने 7 वें जन्मदिन पर 7 पौधे रोपे। गोलू पिछले दो वर्षों से लगातार पौधरोपण और पर्यावरण जागरूकता के कार्यों से जुड़े हुए हैं। बच्चे जिस उम्र मेँ जन्मदिन दिन के गुब्बारे फुलाते हैं वहीँ गोलु ने पर्यावरण को सहेजने का सन्देश दिया।

मियावाकी पद्धति से किया पौधरोपण
कम जगह में अधिक से अधिक पौधे उगाने और सघन हरित आवरण तैयार करने के लिए गोलू ने जापानी वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित मियावाकी पद्धति (Miyawaki Method) को अपनाया है।
क्या है मियावाकी पद्धति?
कम स्थान में सघनता: इस तकनीक में प्रति वर्ग मीटर में स्थानीय (देशी) प्रजातियों के 2 से 4 पौधे पास-पास लगाए जाते हैं।
तेज विकास: पारंपरिक वनों की तुलना में इस पद्धति से पौधे लगभग 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और जंगल 30 गुना अधिक सघन बनता है।
कम रख-रखाव: शुरुआती 2-3 वर्षों तक नियमित देखभाल के बाद यह छोटा वन पूरी तरह आत्मनिर्भर और प्राकृतिक रूप से विकसित हो जाता है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
पिता: श्री मदन पुरी (प्रधानाचार्य, राजकीय इंटर कॉलेज छत्यानी)
माता: श्रीमती मंजू गोस्वामी (गृहणी)
पारिवारिक संस्कारों और बाल मन में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता के कारण गोलू का यह प्रयास न केवल गरुड़ घाटी बल्कि पूरे उत्तराखंड के युवाओं और बच्चों के लिए प्रेरणादायक है।
उत्तराखंड की हसीन वादियों में जहाँ प्रकृति का सौंदर्य बिखरा है, वहीं बागेश्वर जिले के गरुड़ विकासखंड से पर्यावरण प्रेम की एक अद्भुत और प्रेरणादायक मिसाल सामने आई है। यहाँ राजकीय प्राथमिक विद्यालय मजकोट में दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले महज सात वर्षीय बालक गोलू ने इतनी छोटी सी उम्र में वह कर दिखाया है, जिसे करने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। गोलू ने अब तक 600 से अधिक पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण की एक नई इबारत लिख दी है।
जीआईसी मजकोट में कार्यरत प्रवक्ता मदन पूरी और मंजू पूरी के घर जन्मे इस नन्हे पर्यावरण प्रेमी के कदम छोटी उम्र में ही बड़े मकसदों की ओर बढ़ चुके हैं। जहाँ इस उम्र के बच्चे खेल-खिलौनों और टीवी-मोबाइल में अपना समय बिताते हैं, वहीं गोलू का अधिकांश समय मिट्टी, पौधों और हरियाली के बीच गुजरता है।
प्रकाश चंद्र आर्या, प्रभागीय वन अधिकारी बागेश्वर ने गोलु पुरी की प्रसंशा करते हुए कहा कि इतनी कम उम्र मेँ गोलु का पर्यावरण प्रेम सबके लिए एक़ प्रेरणा है. आज दुनिया मेँ तमाम तरह के पर्यावरणीय संकट हैं ऐसे मेँ गोलु की तरह पेड़ लगाना और उनकी सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है।
गोलू के इस अनोखे जूनून के पीछे उनके परिवार का मार्गदर्शन और संस्कार हैं। माता-पिता के शैक्षणिक और जागरूक परिवेश ने नन्हे गोलू के मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम का बीज बोया। मदन पूरी और मंजू पूरी ने गोलू की इस रुचि को पहचाना और उसे हर कदम पर प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे गोलू की यह आदत एक जुनूनी अभियान में बदल गई।
राजकीय प्राथमिक विद्यालय मजकोट में दूसरी कक्षा के छात्र गोलू का यह प्रयास सिर्फ पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, वह उनकी देखभाल भी एक गार्जियन की तरह करता है। अपने हाथों से लगाए गए 600 पौधों को सींचना और उनकी सुरक्षा करना उसकी रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। स्कूल परिसर हो या गाँव के आसपास की खाली जमीन, गोलू हर जगह हरियाली बिखेरने के मिशन में जुटा हुआ है।
गोलू के द्वारा किया गया पौधा रोपण – पत्थर चट्टा गुड़हल, , बांज, बुराश, देवदार, ऐलोवीरा, खर प्लानट, अमलतास, कीवी, संतरा, कागजी नींबू, आडू, अमरूद, ऑक्ररी का, मोरपंखी, तेजपत्ता.
आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे समय में मजकोट के इस सात साल के बालक की यह पहल हर किसी के लिए एक सबक है। गोलू ने यह साबित कर दिया है कि पर्यावरण को बचाने के लिए उम्र नहीं, बल्कि दृढ इच्छाशक्ति और सच्चे समर्पण की आवश्यकता होती है।
गरुड़ विकासखंड का यह छोटा सा गोलू आज न सिर्फ अपने विद्यालय और क्षेत्र का मान बढ़ा रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और सुरक्षित भविष्य की नींव भी रख रहा है। गोलू की यह अनूठी कहानी हम सभी को प्रकृति से जुड़ने और कम से कम एक पौधा लगाने की प्रेरणा देती है।



















