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गरुड़ की 120 साल पुरानी रामलीला: बदलते दौर की कहानी

गरुड़ की 120 साल पुरानी रामलीला: संस्कृति, पीढ़ियों का जुड़ाव और बदलते दौर की कहानी

विपिन जोशी

उत्तराखंड की सुरम्य कत्यूर घाटी इन दिनों रामलीला के पावन मंचन से सराबोर है। नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही यहाँ सांस्कृतिक उल्लास का माहौल है। इसी कड़ी में, गरुड़ की ऐतिहासिक आदर्श रामलीला कमेटी से पिछले 50 वर्षों से जुड़े साहित्यकार और रंगकर्मी  मोहन जोशी ने अपने लंबे सफर, संस्कृति के बदलते स्वरूप और रामलीला से जुड़ी यादों को साझा किया। मोहन जोशी विगत 25 वर्षों से गरुड़ में दशरथ की भूमिका निभा रहे हैं। विगत कई वर्षों से केकई दशरथ संवाद को कुमाउनी गायन शैली में किया जाता है।  दर्शकों ने मोहन जोशी के इस प्रयोग को खूब सराहा।

मोहन जोशी कहते हैं कि कत्यूर घाटी में रामलीला का मंचन कोई साधारण आयोजन नहीं है, बल्कि यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा है। आदर्श रामलीला कमेटी, गरुड़ का इतिहास लगभग 120 वर्ष पुराना है तो कत्यूर रामलीला कमेटी ने 89 वें वर्ष में प्रवेश किया है। इस बार गरुड़ में आदर्श रामलीला और कत्यूर  रामलीला—दोनों का आयोजन नवरात्रि से ही शुरू हो चुका है, जो क्षेत्र के सांस्कृतिक वैभव को और अधिक बढ़ा रहा है।

मोहन जोशी का इस रामलीला मंचन से 50 वर्षों का अटूट जुड़ाव रहा है। उन्होंने अपने इस सफर को याद करते हुए बताया –

“मैं जब 10 साल का था, तब पहली बार मुझे शत्रुघ्न के अभिनय के लिए चुना गया था। उसके अगले साल सखी बना। इसके बाद भगवान राम की कृपा से मुझे कई महत्वपूर्ण किरदार निभाने का अवसर मिला।”

इन पांच दशकों में उन्होंने शूर्पणखा, अंगद, परशुराम, सुषेण वैद्य, विभीषण, सीता, लक्ष्मण, जटायु, सुग्रीव, नारद, और लव-कुश कांड में भगवान राम की भूमिकाओं सहित अहिल्या और कई अन्य पात्रों को जीवंत किया है। गरुड़ के अलावा उन्होंने सिरकोट, मठखाल, भवाली और नैनीताल के प्रतिष्ठित मंचों पर भी अपनी कला का प्रदर्शन किया है।

पुराने दिनों को याद करते हुए वे एक भावुक तस्वीर पेश करते हुए कहते हैं तब मसाल की रोशनी में जुटती थी भीड़। राजकीय इंटर कॉलेज गरुड़ के प्रांगण में होने वाली रामलीला को देखने के लिए आसपास के दर्जनों गाँवों- लखनी, धैना, शिलंगवाड़ी, मठखाल , लौबाज, रतमटिया, कौलाग, द्योनाई घाटी, सीर, सिमार, घेटी,  भिलकोट और डंगोली, तैलिहाट, कज्यूली से लोग पैदल चलकर आते थे।

रातभर रामलीला देखने के बाद, लोग हाथ में मसाल जलाकर सुबह 3:00 या 4:00 बजे अपने घर पहुँचते थे। दिनभर कठिन परिश्रम करने के बाद भी कलाकारों का उत्साह बढ़ाने के लिए जनता का यह समर्पण अद्वितीय था।

बीते 50 वर्षों में रामलीला के स्वरूप में आए बदलावों पर चर्चा करते हुए जोशी बताते हैं कि पहले के शास्त्रीय राग-रागिनियों (जैसे मालकोश, विहाग, खमाज आदि) का गायन अब कम हो गया है। आज के दौर में राधेश्याम शैलियों, कव्वालियों और नए प्रयोगों ने जगह ले ली है।

हालांकि, दर्शकों का आज भी राम के जीवन और पात्रों के संवादों से गहरा नाता है। लोग आज भी परशुराम के प्रसिद्ध संवादों और पुराने लोकप्रिय गीतों को कलाकारों के मुँह से सुनना पसंद करते हैं। अपनी ओर से उन्होंने पिछले 25 वर्षों में दशरथ के अभिनय में कुमावनी भाषा और लोक-संवेदनाओं (जैसे “प्यारी कैकई, ओ मेरी प्यारी  बुलाणी किले न्हें”) को जोड़कर एक नया और अनूठा प्रयोग किया है।

इस वर्ष की रामलीला का एक सबसे बड़ा और स्वागत योग्य पहलू यह है कि आदर्श रामलीला कमेटी, गरुड़ में भी मातृशक्ति का पदार्पण हुआ है। बहुत से किरदार महिला पात्रों द्वारा बखूबी निभाए जा रहे ये किरदार रंगमंच में लैंगिक समता और महिलाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हैं।

एक दौर ऐसा भी आया था जब रामलीला के प्रति लोगों का जुड़ाव कम होने लगा था और आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। उस कठिन समय को याद करते हुए उन्होंने स्व के.डी. पांडे के योगदान को सराहा, जिनके सहयोग और प्रयासों से आज आदर्श रामलीला कमेटी को एक स्थायी व्यवस्था और भव्य मंच मिल पाया है। आज उस परिसर में सांस्कृतिक बैठकें, संगीत कक्षाएँ और खेलकूद गतिविधियाँ भी संचालित हो रही हैं।

संस्कृति और समाज के इस महाकुंभ के संदेश पर उनका मानना है कि रामचरितमानस और भगवान राम के आदर्श आज की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं।

  यह माध्यम आपसी रिश्तों के प्रति कर्तव्य, पारिवारिक तादात्म्य और एक आदर्श समाज के निर्माण में मदद करता है।

आज तकनीक के दौर में सोशल मीडिया के माध्यम से जापान, अमेरिका, नीदरलैंड और श्रीलंका तक कत्यूर की रामलीला पहुँच रही है। हमें इस मंच का उपयोग कर युवाओं को नशे और गलत प्रवृत्तियों से दूर रखना होगा।

यदि समाज तन, मन और धन से अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाए, तो आने वाले समय में इसका विस्तार और अधिक व्यापक होगा और सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण भी होगा।

कत्यूर घाटी, गरुड़ की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उस लोक-संस्कृति की धड़कन है जो अतीत की यादों को सहेजते हुए, आधुनिकता के साथ कदमताल करते हुए समाज को नैतिक मूल्यों और संस्कारों से जोड़ रही है।

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