विपिन जोशी…
कत्यूर घाटी की अमर सांस्कृतिक धरोहर: 89 वर्षों का अविरल रंगमंचीय सफर
कुमाऊँ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गोद में बसी कत्यूर घाटी (बैजनाथ-गरुड़) न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति और नाट्य परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। रामलीला, होली, कोट भ्रामरी मेला, कत्यूर महोत्सव इस सांस्कृतिक चेतना का सबसे जीवंत प्रतीक है। विगत 89 वर्षों (1940 के दशक से) से निरंतर आयोजित हो रही यह रामलीला मंचन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संपूर्ण कत्यूर क्षेत्र की सामाजिक समरसता, कला साधना और अटूट आस्था का ऐतिहासिक दस्तावेज है।
उत्तम सिंह रावत जी मूल रूप में ग्राम-शंखधुरा, (तिकसैन) मुनस्यारी में रहते थे। सन् 1930-32 के आसपास सेठ महिमिन सिंह पांगती जी साझेदारी में व्यापार करने गरूड़ ले आये। गरूड़ में उनका व्यापार काफी अच्छा था। व्यापार के साथ-साथ उनको सामाजिक कार्यों में भी अधिक रुचि थी। उस वक्त रामलीला का मंचन गढ़सेर गाँव में होता था। उन्होंने अपने प्रयासों से रामलीला का मंचन गरूड़ में करवाया तथा कई वर्षों तक रामलीला का संचालन किया।
1940 के दशक में जब आधुनिक संसाधनों का सर्वथा अभाव था, तब कत्यूर घाटी के कुछ दूरदर्शी एवं कलाप्रेमी बुजुर्गों ने इस रामलीला मंचन का बीजारोपण किया था।
भुवन पाठक, निर्देशक कत्यूर रामलीला कमेटी – सर्वप्रथम 1940 में गरुड़ में सर्वोदय कार्यालय के पास शुरू हुई थी रामलीला तब एक कमेटी थी. स्व.जय बललभ, तब रावण का किरदार किया करते थे। कालांतर में आदर्श रामलीला कमेटी ने गरुड़ में और कत्यूर रामलीला कमेटी ने बैजनाथ में मंचन करना प्रारंभ किया।
शुरुआती दौर में न तो पक्के रंगमंच थे और न ही आधुनिक साउंड-लाइट सिस्टम। पेट्रोमैक्स (गैस की लालटेन) और मशालों की पीली रोशनी में मंच सजता था।
नंदन सिंह अलमियां, संरक्षक – ठिठुरती ठण्ड में दर्शक बिना दरी चराई और पांडाल के मंचन का दृश्यावलोकन करते थे। छिलुके जला कर 8-10 किमी. पैदल चल कर रामलीला देखने आते थे। जब गढशेर में मंचन होता तो कत्यूर घाटी के अलावा कपकोट, कौसानी से भी रामलीला देखने दर्शक आते थे। मनोरंजन के सीमित साधनों के बीच उस दौर में रामलीला मंचन ने लोकप्रियता हासिल की।
मेकअप आर्टिस्ट दिनेश बिष्ट – कलाकारों की पोशाकें और मुकुट स्थानीय कारीगर खुद तैयार करते थे। चेहरे के श्रृंगार के लिए प्राकृतिक रंगों और चावल के आटे जैसी पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता था। विगत चालीस साल से पात्रों को सजा संवार रहे हैं अब तो मेकअप केबहुत से विकल्प मौजूद हैं। पहले कई दिनों तक चेहरे पर मेकअप ला रहता था। संसाधन कम थे लेकिन पात्रों का समर्पण बहुत था, तब राम दल के पात्र दस दिन तक लहसुन, प्याज का भी परहेज करते थे। सात्विक भाव से मंचन में सहयोग करते थे।
बिजली न होने पर भी पूरा गाँव रात-रात भर जागकर मंचन का आनंद लेता था। घर-घर से अनाज और सहयोग राशि जुटाकर इस भव्य आयोजन को पूरा किया जाता था।
नीरज पंत, निर्देशक – कत्यूर रामलीला की सबसे बड़ी पहचान इसकी विशुद्ध कुमाऊंनी शास्त्रीय गायन शैली है। यह उत्तर भारत की सामान्य रामलीलाओं से भिन्न, संगीत और रागों पर आधारित एक अद्वितीय नाट्य विधा है। मालकोष, भैरवी, विहाग, जैजैवनती, राग दुर्गा, देश, खमाज, आदि शास्त्रीय रागों में जब चौपाइयां और छंद गूँजते तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। हारमोनियम की सुरीली तान और तबले की थाप पर संवादों का यह आदान-प्रदान कत्यूर रामलीला को एक उच्चस्तरीय शास्त्रीय कला का दर्जा देता है। स्व. मोहन राम, स्व. गोपाल दत, स्व मदन मोहन जोशी, ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संगीत परंपरा वरिष्ठ गुरुओं से युवाओं तक हस्तांतरित होती रही है। आज अशोक रावत संगीत निर्देशन की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।
89 वर्षों का बदलाव: परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम- समय के साथ कत्यूर रामलीला कमेटी ने अपनी मौलिकता को बचाए रखते हुए आधुनिक बदलावों को सहर्ष अपनाया है:
ललित फर्सवाण, संरक्षक- कत्यूर रामलीला कमेटी ने अपनी समृद्ध मौलिकता को अक्षुण्ण रखते हुए समय के साथ आए आधुनिक बदलावों को सहर्ष स्वीकार किया है। 1940 से 1970 के शुरुआती दौर में जहाँ रामलीला का आयोजन पेट्रोमैक्स, मशालों और हैलोजन की रोशनी में होता था, वहीं आज वर्तमान दौर में डिजिटल एलईडी लाइट्स और हाइ-टेक फोकस का उपयोग किया जाता है। ध्वनि व्यवस्था के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया है; जहाँ पहले कलाकार बिना माइक या साधारण लाउडस्पीकर के संवाद बोलते थे, अब उनकी जगह आधुनिक कॉर्डलेस माइक और डिजिटल साउंड सिस्टम ने ले ली है।
मंच की सजावट में भी अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिलती है, जहाँ कच्चे अस्थायी मंचों और हाथ से चित्रित पर्दों का स्थान अब आधुनिक 3D बैकड्रॉप्स एवं कट-आउट स्टेजों ने ले लिया है। इसके अलावा, तकनीकी विकास के कारण इसकी पहुँच का दायरा भी काफी व्यापक हो गया है; जहाँ पहले यह आयोजन केवल स्थानीय दर्शकों तक ही सीमित था, वहीं आज लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए देश-विदेश में बैठे लोग भी कत्यूर रामलीला का आनंद उठा पा रहे हैं।
पहले एक ही कमेटी थी गरड़ में। कालांतर में दो कमेटी बनी आदर्श रामलीला कमेटी गरुड़, कत्यूर रामलीला कमेटी टानीखेत.
कुछ यादगार किरदार –
खर दूषण – स्व केशव पाण्डे, स्व बहादुर सिंह फर्सवाण. इन्होंने 40 साल तक विभिन्न पात्रों कि भूमिका निभाई.
रावण – स्व भौनदत गढ़शेर – इन्होने भी ताउम्र रावण कि भूमिका निभाई. बाद में इनको स्थानीय स्तर पर भोनदत्त रावण कहा गया.
स्व बुद्धि बल्लभ ग्राम पाए, स्व.शंकर सिंह माल्दे, इनको भी क्षेत्रवासी रावण नाम से अधिक जानते थे।
पुष्कर सिंह रावत अणा, बीस साल रावण का किरदार निभाया। अब संरक्षक की भूमिका में हैं। नए दौर में युवा रावण के तौर पर दीपक गोस्वामी होन्डो को दर्शक भरपूर प्यार दे रहे हैं।
जनक- पूरन गिरी गोस्वामी, अशोक रावत ने वर्षों तक बहुत से किरदार निभाए वर्तमान में संगीत निर्देशन में मुख्य भूमिका है।
सुलोचना- गौरी शंकर गोस्वामी सुलोचना का किरदार निभाया इनके बेटे ने राम तथा सूर्पनखा का ऐतिहासिक किरदार निभाया।
कैलाश दा – ताड़का, निषाद, राम, सुमंत आदि किरदार निभाए और अपनी अदाकारी से मंच को जीवंत किया. स्व. हरीश नेगी ने पुराने दौर के कलाकारों की परम्परा को आगे बढ़ाया और लम्बे समय तक सुग्रीव की भूमिका अदा की आज उनके पुत्र भगवत नेगी कत्यूर रामलीला मंचन मे अपनी भूमिका दे रहे हैं.
संजय फर्सवाण – भरत और हनुमान का यादगार किरदार निभाया। दस दिनों तक लहसुन, प्याज का की परहेज करते थे और र एक साधक की तरह हनुमान की भूमिका निभाते आए।
राम/लक्ष्मण की यादगार भूमिकाओं में – स्व पूरन तिवारी गढ़शेर, संतोष जोशी, कुंदन सिंह, नीरज पंत, दीपक नेगी, संजय वर्मा, कैलाश जोशी गुड्डू, भास्कर गोस्वामी,.
विभीषण – स्व. गुलाब गिरी बैजनाथ आपने लंबे समय तक दशरथ का किरदार भी निभाया। आवाज के धनी स्व बंशी गिरी जी ने कई वर्षों तक हनुमान और दशरथ का यादगार किरदार निभाया।
स्व. सूपी खान ने डान्सर की भूमिका में दर्शकों का खूब मनोरंजन किया तो, जोकर के किरदार में स्व जगदीश रावत की ऐतिहासिक पहचान हास्य कलाकार के रूप में स्थापित हुई, आदर्श रामलीला कमेटी गरुड़ के वीरू जोकर को लोग भूला नहीं सकते. रंगमंच को स्थानीप हास्य से जोड़ना इन दोनों कलाकारों की पहचान थी।
मेकअप और मंच निर्माण – दिनेश बिष्ट
संगीत निर्देशन – स्व.मदन मोहन जोशी, स्व.गोपाल राम, अशोक रावत. स्व मदन मोहन जोशी पेशे से शिक्षक थे। उन्होने गुर शिष्य परंपरा के तहत दर्जनों संगीत प्रमियों को रामलीला परम्परा में हारमोनियम वादन सिखाया था। वर्तमान में अशोक रावत, भुवन ब्रजवासी उस परंपरा के वाहक हैं।
निर्देशन/ संरक्षक स्व. गोपाल दत्त पाठक, दयाल गिरी, स्व. मोहन सिंह रावत, स्व. नरेश फर्सवाण, ललित फर्सवाण, नंदन सिंह अलमियां, हरीश रावत। कई दशक तक स्व. गोपाल दत्त पाठक ने कत्यूर रामलीला कमेटी को एक आधार स्तंभ की तरह मजबूती से एक सूत्र में पिरोया । उनका अनुशासन और रंगमंच का ज्ञान पात्रों को प्रेरित करता रहा।
89 वर्षों के इस सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में पिरोया है। आज व्यापारी, किसान, शिक्षक और युवा, सब मिलकर इस आयोजन को सफल बनाते हैं।
आज के डिजिटल युग में, जहाँ पारंपरिक लोक कलाएँ लुप्त होने के कगार पर हैं, वहीं कत्यूर रामलीला कमेटी ने अपनी नई पीढ़ी को इस विरासत से सफलतापूर्वक जोड़े रखा है। आज के छोटे-छोटे बच्चे और युवा जिस लगन से शास्त्रीय रागों को सीखकर मंच पर उतरते हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि कत्यूर घाटी की यह धरोहर आने वाले कई दशकों तक इसी तरह जगमगाती रहेगी।
कत्यूर रामलीला कमेटी के 89 वर्ष केवल एक संख्या नहीं हैं; यह 89 सालों का त्याग, कला-समर्पण और लोक-संस्कृति को जीवित रखने का संकल्प है। बैजनाथ धाम की पावन भूमि पर गूँजते रामकथा के ये सुर कत्यूर घाटी की पहचान हैं, जो हर वर्ष शरद ऋतु की रातों में भक्ति, साहित्य और संगीत का एक नया इतिहास रचते हैं।





















