विपिन जोशी
पहाड़ों का पलायन, तराई का संघर्ष: बिंदुखत्ता और उत्तराखंड के वन अधिकारों की कड़वी सच्चाई
उत्तराखंड राज्य निर्माण के 26 वर्षों का इतिहास केवल जल, जंगल, जमीन के अधिकारों के वादों से भरा नहीं है, बल्कि यह विकास और संरक्षण के नाम पर अपने ही लोगों को बेदखल करने की विडंबना का गवाह भी है। आज जब प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों की सुर्खियां वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने, बुलडोजर की कार्रवाइयों और जंगलात की जमीनों के आंकड़ों पर बहस कर रही हैं, तब उत्तराखंड के तराई क्षेत्र बिंदुखत्ता, पुछड़ी और पर्वतीय गांवों का यह सवाल शासन व्यवस्था के मुंह पर एक सीधा तमाचा है।
अचानक वन भूमि का दायरा कागजों में 63 प्रतिशत से बढ़कर 73 प्रतिशत कैसे हो गया? क्या यह 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी उन लोगों के अधिकार छीनकर की गई जो सदियों से या दशकों से इन जमीनों पर बसकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं?
क्या है बिंदुखत्ता आंदोलन और इसकी पृष्ठभूमि?
नैनीताल जिले के लालकुआं के पास स्थित बिंदुखत्ता कोई नया अतिक्रमण नहीं है। इसका इतिहास उत्तराखंड के सामाजिक और भू-राजनीतिक ताने-बाने से गहराई से जुड़ा हुआ है:
1970-80 के दशक में जब पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार और संसाधनों का अभाव बढ़ा, तब पूर्व सैनिकों, स्वतंत्रता सेनानियों और आपदा पीड़ितों को इस क्षेत्र में बसाया गया।
आज बिंदुखत्ता लगभग 26 खत्तों (बस्तियों) में फैला है, जहाँ लगभग 70,000 से 80,000 की आबादी निवास करती है। यहाँ स्कूल, सड़कें, बिजली, और बैंक जैसी सुविधाएं तो पहुंच गईं, लेकिन “कानूनी पहचान” नहीं मिली।
दशकों से बिंदुखत्ता के निवासी इसे ‘राजस्व ग्राम’ घोषित करने और भूमिधरी (मालिकाना) अधिकार देने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं।
वन विभाग इसे आरक्षित वन भूमि मानता है, जिसके कारण तकनीकी रूप से यहाँ के निवासी कानूनी अधिकारों, स्थायी पट्टों और सरकारी आवास योजनाओं से वंचित रहते हैं। चुनाव के समय यह बड़ा वोट बैंक बनता है, लेकिन चुनाव बीतते ही यह इलाका ‘अतिक्रमण’ के दायरे में ला दिया जाता है।
10 प्रतिशत जमीन का गणित और जन-विरोधी नीतियां
स्थानीय जन-आंदोलनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य सरकारें वन भूमि के आंकड़ों का खेल खेलकर आम नागरिकों को हाशिए पर धकेल रही हैं:
पर्वतीय क्षेत्रों में लगभग 4,000 से अधिक गांव पूरी तरह खाली (‘भूतहा गांव’) हो चुके हैं । वहां की कृषि भूमि अब झाड़ियों और जंगलों में तब्दील हो रही है।
एक तरफ पर्वतीय गांवों की खाली हुई भूमि को वन क्षेत्र में दिखाकर आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर (63% से 73%) प्रस्तुत किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ तराई में पीढ़ियों से रह रहे समुदायों को ‘बेदखली’ का नोटिस थमा दिया जाता है।
पुछड़ी (रामनगर) और बिंदुखत्ता जैसे क्षेत्रों में जब पारंपरिक और विस्थापित समाज अपनी ही जमीन पर छत का हक मांगते हैं, तो उन पर वन अधिनियमों की सख्त धाराएं थोप दी जाती हैं। गरीबों के कच्चे-पक्के मकानों और खेतों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें बेघर कर दिया जाता है।
वर्ष 2006 में बने अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम के तहत उन समुदायों को अधिकार देने का प्रावधान है जो पीढ़ियों से जंगलों पर निर्भर हैं।
किंतु उत्तराखंड में नौकरशाही और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते इस कानून का लाभ वास्तविक भूमिहीनों और बिंदुखत्ता जैसे पारंपरिक समुदायों तक नहीं पहुंच सका। विडंबना यह है कि बड़े-बड़े रिजॉर्ट्स, कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स और खनन पट्टों के लिए वन भूमि का डाइवर्जन बिना किसी अड़चन के हो जाता है, लेकिन अपनी आजीविका कमाने वाले आम नागरिकों के लिए कानून का चाबुक हमेशा तैयार रहता है।
26 साल के उत्तराखंड की यह व्यथा उजागर करती है कि राज्य की नीतियां अपने ही मूल निवासियों के अनुकूल नहीं बन सकी हैं। यदि सरकार इस ज्वलंत समस्या का स्थाई हल चाहती है, तो उसे निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
बिंदुखत्ता और पुछड़ी जैसी पुरानी बस्तियों को वन भूमि के विवाद से निकालकर त्वरित रूप से राजस्व ग्राम घोषित कर निवासियों को मालिकाना हक दिए जाएं।
खाली पड़े पर्वतीय गांवों और कृषि भूमि के संरक्षण के लिए सख्त भू-कानून बनाया जाए, ताकि पहाड़ों से पलायन रुके और तराई पर अचानक जनसंख्या का दबाव न पड़े।
आंकड़ों का भ्रमजाल फैलाने के बजाय वन विभाग और राजस्व विभाग मिलकर एक पारदर्शी सर्वे कराएं, जिससे पीढ़ियों से रह रहे बेघर लोगों को उजाड़ने के बजाय पुनर्वासित किया जा सके।
बिंदुखत्ता का आंदोलन केवल जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं है; यह पहचान, स्वाभिमान और राज्य निर्माण की उस मूल भावना की रक्षा की लड़ाई है जिसके लिए उत्तराखंड के लोगों ने संघर्ष किया था।
















