विपिन जोशी..
कत्यूर घाटी की ३० होलियां पहुंची कोट भ्रामरी मंदिर
खड़ी होली की गूंज से गूंज उठा बैजनाथ-कोट भ्रामरी, युवा पीढ़ी ने परंपरा को नया आयाम दिया
बैजनाथ। बैजनाथ मंदिर में खड़ी होली गायन के बाद सैकड़ों की संख्या में होलियार सीधे कोट भ्रामरी मंदिर पहुंचे। मंदिर परिसर में देवी को समर्पित गीत गूंज उठा—
“देवी को थान पतरिया नाचे फर फर होय अम्बा धन तेरो… दर्शन को तेरो आयो अम्बा जन तेरो…”
खड़ी होली की धुन से पूरी कत्यूर घाटी गूंज उठी। हजारों की संख्या में दूर-दराज के गांवों से होलियार बैजनाथ और कोट भ्रामरी मंदिर पहुंचे। कुछ गाड़ियों से तो कुछ पैदल ही चले आए। सफेद कुर्ता-पायजामा और सफेद रंग की टोपी में सजे होलियारों ने एक स्वर में प्रेम और भाईचारे का संदेश गाया। मंदिर कमेटी ने होलियारों के लिए शीतल पेय का स्टॉल भी लगाया था। नींबू पानी, माल्टा और बुरांश के जूस से होलियारों ने अपना गला तर किया।
युवा पीढ़ी ने परंपरा को जीवंत किया
पत्रकार हरीश जोशी ने कहा, “कुमाऊं की होली अब युवाओं को आकर्षित कर रही है। युवाओं ने खड़ी होली की परंपरा को जीवंत रखा है। होली में संस्कृति के सकारात्मक पक्ष उजागर होते दिख रहे हैं।”
प्रोफेसर डॉ. हेम चंद्र दूबे (हिंदी विभाग, द्वाराहाट) ने अपनी बात रखते हुए कहा, “होली में अनुशासन और प्रेम साथ-साथ चलते हैं। सब संयुक्त रूप से नियम बनाते हैं और उन्हें पालन भी करते हैं। नशा-मुक्त होली सिल्ली गांव की पहचान है।”
पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण ने कहा, “खड़ी होली की परंपरा को हमारी नई पीढ़ी ने नया आयाम दिया है। लोगों में आपसी भाईचारा पनप रहा है, यह बहुत अच्छा संकेत है। कत्यूर घाटी में होली की परंपरा अब समृद्ध रूप ले रही है।”
हेली सेवा से भी युवा पहुंचे
हेली स्टाफ गरुड़ के योगेश गोस्वामी ने बताया, “हेली सेवा का लाभ लेकर युवा छुट्टी लेकर भी होली मनाने पहुंच रहे हैं। चतुर्दशी के दिन हल्द्वानी से हेली सेवा के तीन फेरे लगे।”
मिलन समारोह में शामिल प्रमुख हस्तियां
कोट भ्रामरी होली मिलन समारोह में जिला पंचायत सदस्य बलवंत नेगी, जनार्दन लोहनी, दर्जा मंत्री शिव सिंह बिष्ट, पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण,जगदीश पांडे पत्रकार,चंदन जायका, अखिल जोशी, लक्ष्मण आर्या, घनश्याम जोशी, ब्लॉक अध्यक्ष कांग्रेस गरुड़ नरेंद्र बिष्ट, ब्लॉक अध्यक्ष यूकेडी गिरीश कोरंगा, डॉ. हेम चंद्र दूबे, बसंत नेगी, रमेश गोस्वामी सहित सैकड़ों स्थानीय नागरिक मौजूद रहे।
कत्यूर घाटी की यह खड़ी होली न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी, बल्कि युवा पीढ़ी द्वारा संरक्षित सांस्कृतिक विरासत का भी सुंदर उदाहरण साबित हुई। प्रेम, अनुशासन और भाईचारे की यह मिसाल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी।





