विपिन जोशी.
कत्यूर घाटी में खड़ी होली और चीर बंधन का इतिहास फाल्गुन की अष्टमी के दिन कोट भ्रामरी में भेटा गांव के ग्रामीण सदियों से चीर बंधन करते आए हैं।
कोट भ्रामरी मंदिर में चीर बंधन के बाद कत्यूर में खड़ी होली का आगाज़ हो जाता है। भेंटा गांव के पुराने होली डांगर लोहनी ने जानकारी देते हुए बताया कि कुमाऊं में खड़ी होली और चीर बंधन का इतिहास कम से कम 400 साल पुराना हैं। इसका मूल स्वरूप चंद राजवंश (15वीं शताब्दी से) के समय चंपावत और अल्मोड़ा के दरबारों से जुड़ा है। तभी से कोट भ्रामरी मंदिर में भेंटा गांव के लोहनी चीर बंधन करते आ रहे हैं।
खड़ी होली की शुरुआत चीर बंधन या निशान बंधन से होती है, जो होली का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।
चीर बंधन मुख्य रूप से फाल्गुन शुक्ल एकादशी रंगवाली एकादशी या आमल की एकादशी को तथा कुछ जगह होलिकाष्टमी को किया जाता है। यह खड़ी होली की शुरुआत का प्रतीक है।
कोट भ्रामरी मंदिर में होली गीत कोउ बांधे चीर हो रघुनन्दन राजा की गूंज के साथ चीर बंधन किया गया।
होली गीतों के साथ रंग बिरंगे कपड़ों को अबीर-गुलाल से रंगकर चीर स्तंभ की प्राण प्रतिष्ठा की गई।
होलियार नंदाबल्लभ लोहनी ने बताया कि चीर को होलिका हिरण्यकश्यप की बहन, का प्रतीक माना जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत, सर्दी के अंत और नए बुआई मौसम की शुरुआत को दर्शाता है। कत्यूर घाटी में खड़ी होली की विशेष परंपरा है। भेंटा गांव को चीर बंधन का सौभाग्य चंद्रवंशी राजाओं ने दिया था जो आज तक जारी है।
जिला पंचायत सदस्य जनार्दन लोहनी ने जानकारी दी खड़ी होली कुमाऊं की संस्कृति का प्रतीक है। यह क्षेत्र की एकता और भाई चारे का भी समावेश है। चीर हरण की परंपरा मजेदार है। गांव वाले चीर की रक्षा करते हैं। यदि कोई दूसरे गांव का व्यक्ति चीर का टुकड़ा तोड़कर नदी पार ले जाए, तो अगले साल उस गांव की होली बंद हो सकती है। होलिका दहन की रात (पूर्णिमा से पहले) चीर को जलाया जाता है, जलने के बाद प्रसाद बांटा जाता है। कई जगह राज ध्वज (निशान) का भी प्रयोग होता है।
खड़ी होली का आगाज़ चीर बंधन से होता है। खड़ी होली और चीर बंधन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट ने बताया कि
चंद राजाओं के दरबार में ब्रज (मथुरा-वृंदावन) की संगीत परंपराओं का मिश्रण हुआ, जहां मैदानी इलाकों (रामपुर, कन्नौज आदि) से आए उस्तादों (जैसे अमानत अली खां, गम्मन खां आदि) ने स्थानीय खड़ी होली को शास्त्रीय रंग दिया। समय के साथ यह परंपरा पूरे कुमाऊं में फैली और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जीवंत है। कुछ विद्वान इसे चंद शासनकाल (10वीं-11वीं शताब्दी) से भी जोड़ते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से 15वीं शताब्दी से इसका वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ। अंग्रेजी काल में भी यह परंपरा जारी रही, और यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के कलाकार भी इसमें भाग लेते हैं। नैनीताल जैसे शहरों में मुस्लिम होल्यार आज भी हिस्सा लेते हैं, जो इसकी समावेशी प्रकृति दिखाता है।
चीर बंधन और खड़ी होली की परंपरा कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान है, जो संगीत, एकता और कृषि जीवन से जुड़ी हुई है। आज भी यह जीवित है और पर्यटकों को आकर्षित करती है।





