विपिन जोशी, संपादक, स्वर स्वतंत्र

मझार चौरा, गरुड़ के कृषक लाल सिंह, खेती किसानी में कर रहे हैं आधुनिक प्रयोग। हाइड्रोपोनिक खेती करने वाले जिले के पहले किसान बने।
लाल सिंह ने सब्जी उत्पादन के साथ एवाकाडो उगा कर मिशाल पेश की। पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक खेती में तलाश रहे हैं भविष्य की संभावना। एवाकाडो के पांच पेड़ एक साल में ढाई कुंतल फल देते हैं। 150 रुपया किलो तक बिकता है एवाकाडो, अभी मार्केट ने इस फल की खूब डिमांड भी है। एक पेड़ पांच साल बाद फल देता है।
हाइड्रोपोनिक खेती के बारे में लाल सिंह ने बताया कि वे 2019 से हाइड्रोपोनिक खेती कर रहे हैं। पानी की बचत के साथ उच्च गुणवत्ता के विटामिन और पोषक तत्व हाइड्रोपोनिक खेती से उगाई जाने वाली सब्जियों में पाई जाती है, ठंडी जलवायु में उक्त खेती उपयुक्त होती है। उक्त तकनीक में न खेत की जरूरत है न हल जुताई की। हाइड्रोपोनिक खेती के साथ लाल सिंह जैविक सब्जी और एवाकाडो भी प्रचुर मात्रा में उगा रहे हैं। स्वर स्वतंत्र से बात करते हुए लाल सिंह ने कुछ तकनीकी जानकारी साझा करते हुए बताया कि हाइड्रोपोनिक खेती एक आधुनिक कृषि तकनीक है जिसमें मिट्टी के बिना, पानी के पाइपों में पौधों को उगाया जाता है। इसमें पौधों की जड़ें सीधे पोषक तत्व युक्त पानी में डुबोई जाती हैं या पानी के घोल का छिड़काव किया जाता है।
क्या हैं मुख्य विशेषताएं:
1. मिट्टी की जरूरत नहीं, पौधे मिट्टी की बजाय पानी, रेत, ग्रेवल, कोको कोयर या पर्लाइट जैसे इनर्ट माध्यम में उगते हैं।
2. पोषक तत्व सीधे जड़ों तक पानी में घुले आवश्यक पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम आदि) पौधों को मिलते हैं।
3. नियंत्रित वातावरण, तापमान, रोशनी, पी एच स्तर और ऑक्सीजन को आसानी से नियंत्रित किया जाता है।
भारत के बड़े शहरों में जैसे पुणे, बेंगलुरु, दिल्ली में कई स्टार्टअप हाइड्रोपोनिक्स से सलाद, जड़ी-बूटियां, स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं।
लाल सिंह अपने घर में हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से सब्जियां जैसे लेट्यूस, पालक, टमाटर, खीरा। तथा फलों में स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी आदि का उत्पादन कर रहे हैं।
लाल सिंह ने पारंपरिक खेती किसानी के साथ हाइड्रोपोनिक्स को भविष्य की खेती के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है , लाल सिंह ने बताया कि पानी की कमी, मिट्टी की कमी और बढ़ती आबादी के लिए हाइड्रोपोनिक्स एक आदर्श व छोटे स्तर पर घर में की जाने वाली खेती है। मात्र ₹5,000 से यह खेती छोटे स्तर से शुरू की जा सकती है ।
विपिन जोशी, गरुड़





