जंगल धधकने लगे नवंबर में

विपिन जोशी, संपादक, स्वर स्वतंत्र

उत्तराखंड के जंगलों में नवंबर की आग: एक पर्यावरणीय चेतावनी

सर्दियों का आगमन हो चुका है, किंतु उत्तराखंड के पहाड़ अब ठंडक की बजाय धुएं की चपेट में हैं। कौसानी पिनाथ से लेकर गरुड़ घाटी तक, नवंबर महीने में ही विभिन्न स्थानों पर जंगल धधक उठे हैं। यह कोई नई घटना नहीं है, लेकिन फायर सीजन अब मौसमी सीमाओं से परे हो चुका है—गर्मियों का विशेषाधिकार नहीं रह गया। सर्दियों में भी आग की घटनाएं सामान्य हो चली हैं, जो राज्य के पर्यावरणीय संकट को उजागर करती हैं।

उत्तराखंड वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024 में नवंबर महीने तक राज्य में 1,200 से अधिक जंगल आग की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से कुमाऊं क्षेत्र (जिसमें कौसानी और गरुड़ शामिल हैं) में 450+ मामले सामने आए। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले वर्ष की तुलना में नवंबर में आग की घटनाओं में 35% की वृद्धि हुई है।

कौसानी-पिनाथ क्षेत्र में अकेले 150 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि प्रभावित हुई, जिसमें चीड़ के घने जंगल शामिल हैं।

विभागीय रिपोर्ट में 85% घटनाएं मानवजनित बताई गईं—चारा पत्ती, सिगरेट की टहनियां, या जानबूझकर आग लगाना। शेष प्राकृतिक (जैसे सूखे पत्तों का घर्षण)।

लगभग 5 करोड़ रुपये की वन संपदा स्वाहा, साथ ही वन्यजीवों की मौत और मिट्टी का क्षरण। इस नुकसान में शामिल है। पिनाथ जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अब बर्फबारी में 20-25% की कमी दर्ज की गई, जो जलवायु परिवर्तन का संकेत है।

पर्यावरणविद लेखक हरीश जोशी ने बताया कि फायर सीजन अब मौसम के अनुसार नहीं आता अब तो जंगल सर्दियों में भी जल रहे हैं। इसके दुष्परिणाम भयावह होंगे। आज गरुड़ घाटी और कौसानी के जंगल धधकने लगे हैं कल ये आग उत्तराखंड के जंगलों को भस्म कर देगी।

विगत एक सप्ताह में कौसानी और गरुड़ के जंगलों से उठता धुआं किसी नेता, अधिकारी या सामाजिक कार्यकर्ता के लिए भले ही चिंता का विषय न बना हो किंतु जंगल के निवासियों—वन्यजीवों, पक्षियों और स्थानीय ग्रामीणों—के लिए यह हमेशा खतरे की घंटी है। जंगल की आग न केवल इंसानों को प्रभावित करती है, बल्कि संपूर्ण इकोसिस्टम को ध्वस्त कर देती है। जंगल की आग से ऑक्सीजन उत्पादन घटता है, जल स्रोत सूखते हैं, और जैव विविधता खतरें में पड़ती है।

कौसानी का सर्वोच्च शिखर पिनाथ धार्मिक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। दो दशक पूर्व नवंबर-दिसंबर में यहां बर्फबारी होती थी, जो पर्यटकों को आकर्षित करती थी। किंतु अब सर्दी की शुरुआत होते ही जंगल धधकने लगते हैं। मुख्यधारा मीडिया से यह खबर लगभग गायब है— क्योंकि यह ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नहीं बनती है। स्थानीय यूट्यूबर्स नेताओं और अधिकारियों की चरणवंदना में व्यस्त रहते हैं, शायद उनके ‘मोटे लिफाफे’ वहीं से आते हैं।

विभागीय उदासीनता और प्राथमिकताओं का टकराव

संबंधित विभाग को सक्रिय होने से रोकते है। इंटर कॉलेजों में महोत्सव आयोजित हो रहे हैं, जिले में उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस की रजत जयंती मनाई जा रही है—नेता और अधिकारी जश्न में डूबे हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए किसी के पास समय नहीं। राज्य में पराली जलाने से प्रदूषण नहीं होता है, फिर भी इस मुद्दे पर बजट खर्च कर लिया जाता है। वन विभाग के डाटा बताते हैं कि 2024 में आग नियंत्रण के लिए आवंटित बजट का मात्र 40% उपयोग हुआ, शेष कागजी कार्यवाही में फंस गया।

 

मीडिया जगत के पत्रकारों को व्यक्तिगत हित छोड़कर पर्यावरण जैसे प्राथमिक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उत्तराखंड के जंगल राज्य की जीवनरेखा हैं—ये जल, ऑक्सीजन और जैव विविधता प्रदान करते हैं। यदि नवंबर में ही आग लग रही है, तो ग्रीष्म काल में क्या होगा? यह जलवायु परिवर्तन, मानव हस्तक्षेप और उदासीनता का घातक कॉकटेल है।

समय है कि संबंधित विभाग डाटा को नजर अंदाज ना करें, आंकड़ों को आधार बनाकर कार्रवाई करें, सामुदायिक फायर वॉच, सख्त कानून और जागरूकता अभियान के आधार पर जंगलों को बचाने के लिए आगे आएं सिर्फ विभाग ही जंगल बचाएगा इस सोच से उबरे अन्यथा, उत्तराखंड की हरीतिमा धुएं में खो जाएगी। पर्यावरण बचाना अब वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य है।