विपिन जोशी, संपादक, स्वर स्वतंत्र
4 से 5 नवंबर जुटेगा गैरलेख में लिंग थान कौतिक। प्राचीन काल से अब तक गरुड़ के गैरलेख में कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगता है लिंग थान का कौतिक। दिवाली के बाद तुलसी एकादशी के बाद लिंग थान का कौतिक दो दिन तक धूम धाम से मनाया जाता है। लिंग थान कौतिक की मूल मान्यता में पशु धन और खेती किसानी प्रमुख है।
पशु धन और खेती किसानी से जुड़ा है लिंग थान का कौतिक। कुमाऊं और गढ़वाल से लोग आते हैं, दूध, मक्खन, दही का भोग लिंग थान में लगता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का कठिन चढ़ाई चढ़ना और मेलार्थियों को प्रसाद के रूप में पूरी, खीर, सब्जी, दही खिलाना अनूठी परम्परा है।
पौराणिक जनश्रुति के अनुसार, ग्रामीण बताते हैं कि एक ग्वाला था जो दिन भर गायों को चराता उनकी सेवा करता था। एक गाय ऊपर पहाड़ पर जाती और दूध एक लिंग पर चढ़ा आती। एक दिन ग्वाला परेशान हो कर पहाड़ी पर गया और क्रोधित हो पाषाण लिंग को कुल्हाड़े से खंडित कर दिया। लिंग से दूध की धारा बहने लगी। ग्वाले को सपना हुआ कि तुरंत ही शुभ दिन देखकर लिंग को पहाड़ की चोटी में स्थापित करना होगा, हर वर्ष उस लिंग में दूध, मक्खन चढ़ाना होगा तब क्षेत्र में खेती और पशुधन समृद्ध होगा।
तब से लिंग थान में हर वर्ष समृद्धि का प्रतीक मेला लगता है। लिंग थान में अब एक दो धर्मर्मशाल बना दी है हैं, मंदिर का स्वरूप खुला ही है, लोक देवता खुले स्वरूप में पूजे जाते हैं। मंदिर के आस पास स्थान कम है लेकिन पहाड़ी ढलान में भी जिसे जहां जगह मिली वही बना लेते हैं चूल्हा और बनाते हैं विविध पकवान। हर मेलार्थी को प्रसाद खिलाया जाता है। परिचय हो या न हो सभी के लिए प्रसाद या भंडारा उपलब्ध हो जाता है।
मंदिर में दूध, मक्खन के अलावा अब प्लास्टिक रैपर वाली चीजें भी दिखने लगी हैं। लिंग थान जैसे पवित्र स्थल में प्लास्टिक रैपर, प्लास्टिक बोतलों पर प्रतिबंध होना चाहिए। यहां पारंपरिक स्थानीय भोजन को महत्व मिले इस बात के लिए मेला समिति और स्थानीय जन प्रतिनिधियों को मिलकर योजना बनानी चाहिए।
उत्तराखंड के स्थानीय कौतिक में लिंग थान का विशेष महत्व है। फेस बुक, इंस्ट्राग्राम के दौर में आस्था और विश्वास का कौतिक अपनी पहचान बनाए हुए है। यही तो लोक परम्परा का जादू है।





