शारदीय नवरात्र और रामलीला मंचन – विपिन जोशी
आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र प्रारंभ होते हैं। यह पर्व शक्ति की महिमा को प्रदर्शित करता है, क्योंकि शक्ति के अभाव में संसार का संचालन संभव नहीं है। इस दौरान माँ दुर्गा के नौ रूपों, शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक की उपासना की जाती है। दशमी के दिन विजयादशमी के रूप में माँ विजय देवी की पूजा की जाती है।
* हिंदी के शिक्षक डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी ने जानकारी देते हुए बताया कि भगवान श्रीराम ने सर्वप्रथम शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा की थी। रामलीला का आयोजन भी इसी परंपरा का हिस्सा है। कथानक के अनुसार, सीता की खोज में निकले श्रीराम ने नारद जी के सुझाव पर प्रवर्पण पर्वत पर माँ दुर्गा का पूजन किया। दशमी को विजय देवी की पूजा के बाद उन्होंने लंका पर चढ़ाई कर रावण पर विजय प्राप्त की। इसलिए इस पर्व को विजयादशमी कहा जाता है*
संपूर्ण उत्तरभारत में शारदीय नवरात्र में रामलीला मंचन के साथ दुर्गा पूजा का भी महत्व है। कत्यूर घाटी में आदर्श रामलीला कमेटी गरूड़, कत्यूर रामलीला कमेटी को यहां रामलीला मंचन कराने का श्रेय जाता है। स्व. धनगिरी गोस्वामी, स्व. गोपाल दत्त पाठक, स्व. मदन मोहन जोशी, स्व. मोहन सिंह रावत, स्व. जगदीश रावत, स्व. नरेश फर्सवाण आदि कुछ नाम हैं जिनके अथक प्रयासों से गरूड़ क्षेत्र में शारदीय नवरात्र में रामलीला मंचन ने व्यवस्थि आकार ग्रहण किया था। वर्तमान निर्देशक आदर्श रामलीला कमेटी बताते हैं कि पहले मिट्टी के तेल वाले गैस लाइट के उजाले में रामलीला मंचन बिना माइक के होता था। तब पात्रों की आवाज में इतना दम था कि अंतिम लाइन में बैठे व्यक्ति तक सुर, लय ताल के साथ गीत के बोल साफ-साफ पहॅुचते थे। तब महिला पात्रों का अभिनय करना ठीक नहीं माना जाता था। कत्यूर रामलीला कमेटी के व्यवस्थापक दयाल गिरी गोस्वामी ने बताया कि गॉव-गॉव जाकर पात्र धान एकत्र करते थे, उसे बेच कर जो पैसा जुटता था उससे रामलीला मंचन की व्यवस्था होती थी। आज दान दाताओं ने रामलीला मंच बनाया है तो कहीं जमीन और धन दान में देकर कमेटी को मजबूत करने का काम किया है। स्व के डी पांडे ने गरुड़ में भूमि दान दी। कत्यूर रामलीला कमेटी को कृष्ण सिंह फर्स्वाण, नारायण अलमियां, घनश्याम जोशी ने भूमि दान में दी।
कत्यूर रामलीला कमेटी के रंगकर्मी कैलाश बिष्ट विगत चार दशक से रामलीआ और नौटंकी में विभिन्न पात्रों का किरदार निभाते आ रहे हैं। कैलाश बिष्ट कहते हैं मंच पर जाते ही वे किरदार में खो जाते हैं, बिष्ट को ताड़का, केवट, बंदी जन, सुमंत, की भूमिका ने देखने के लिए दर्शक दूर दूर से आते हैं। मंच में महिला रंगकर्मियों ने भी अपना अच्छा स्थान बनाया नीमा गोस्वामी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ती हैं और रंगमंच में सक्रीय रहती हैं। नीमा के दोनों बेटों ने रामलीला में लंबे समय तक राम और लक्ष्मण की भूमिकाएं निभाई. नीमा वर्मा, पेशे से शिक्षिका रह चुकी नीमा वर्मा शबरी और अहिल्या की भूमिका करती है। बदलते दौर में शक्ति की प्रतीक महिलाएं अब बढ़-चढ़कर रामलीला मंचन में प्रतिभाग कर रही हैं।
तालीम में मौजूद रहे
कमेटी के निर्देशक भुवन पाठक, व्यवस्थापक संजय फर्स्वाण, सहसंयोजक नीरज पंत, नंदन सिंह अल्मिया, पूर्व विधायक कपकोट ललित फर्सवान, अशोक रावत, संदीप कुमार, गौरी शंकर गोस्वामी, कैलाश बिष्ट, हेम वर्मा, गौरव वर्मा, विशाल फर्स्वाण, दीपा बिष्ट, दीपक गोस्वामी, गौरव जोशी, नीमा वर्मा, समस्त पात्र।





