भूस्खलन में 2900% की वृद्धि

विपिन जोशी, स्वर स्वतंत्र

उत्तराखंड में खनन नीति, पर्यावरणीय चिंता और विगत एक वर्ष में 650 करोड़ रुपये का बढ़ता राजस्व. 

उत्तराखंड के कुछ हिस्से आपदा की जद में हैं। करोड़ों की क्षति और जान माल का नुकसान हुआ है। पहाड़ सहित मैदानी हिस्से भी आपदा की जद में हैं। ऐसे में पर्यावरण के प्रति चिंता और समीक्षा जरूरी है। वैश्विक ताप के बीच उत्तराखंड की मौजूदा खनन नीति को समझने की कोशिश करते हैं। खनन और टनल डैम, टनल रोड, रेल परियोजनाओं का असर उत्तराखंड के नाजुक पहाड़ों पर पड़ता है। वैश्विक ताप से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और झील बन रही है जो टूट कर पहाड़ी मार्ग से नदी किनारे बस्तियों में तबाही का मंजर पैदा करती है। भूस्खलन से खोखले होते पहाड़ों को समझने के साथ उत्तराखंड सरकार की खनन नीति को भी इस आलेख से समझेंगे।

उत्तराखंड, हिमालयी राज्य होने के कारण, खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता के कारण यहां खनन गतिविधियां सख्त नियंत्रण के अधीन हैं। राज्य की खनन नीति का मुख्य उद्देश्य राजस्व वृद्धि, अवैध खनन पर रोक, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय रोजगार सृजन है। नीति समय-समय पर संशोधित की जाती है, जिसमें नदी तट खनन, रॉयल्टी दरें और तकनीकी निगरानी पर जोर दिया जाता है।

1. खनन नीति का इतिहास और वर्तमान स्थिति। उत्तराखंड में खनन नीति की घोषणा 4 अप्रैल 2001 को की गई थी। इसके बाद कुछ संशोधन हुए, जैसे 2002, 2007 और 2008 के संशोधन।

क्या है मुख्य नीतियां:

खनिज नीति 2011: खनिज संसाधनों के टिकाऊ दोहन पर फोकस। उपखनिज (बालू, बजरी, बोल्डर आदि)

नीति 2015: नदी तट खनन को विनियमित करने के लिए, जिसमें 31 जुलाई 2015 को अधिसूचित किया गया। अक्टूबर 2015 में संशोधन।

उत्तराखंड माइनर मिनरल्स (कॉन्सेशन) रूल्स 2023: नवीनतम नियमावली, जो छोटे खनिजों (जैसे साबुन पत्थर, सिलिका सैंड, चूना पत्थर) के पट्टे, पर्यावरणीय अनुमति और निजी भूमि पर खनन को कवर करती है।

28 अक्टूबर 2021 को नई नियमावली जारी की गई, जिसमें निजी भूमि पर 5 हेक्टेयर तक खनन का पहला अधिकार मालिक को दिया गया। लेकिन नैनीताल हाईकोर्ट ने जनवरी 2022 में इसे स्थगित कर दिया, क्योंकि यह प्रतिस्पर्धी बोली के बजाय सिफारिशी प्रक्रिया को बढ़ावा देता था।

क्या हैं मुख्य प्रावधान

नदी तट खनन (रिवरबेड माइनिंग) मुख्य नदियों (जैसे गंगा, गौला, शारदा) में बालू, बजरी और बोल्डर का खनन। खुदाई की सीमा बढ़ाने और स्टोन क्रशर की नदी से दूरी कम करने के प्रस्ताव हैं। नदियों के दोनों किनारों पर 15 मीटर तक खनन प्रतिबंधित है।

रॉयल्टी और शुल्क: जून 2025 में खड़िया सामग्री (जैसे डोलोमाइट) की रॉयल्टी दरें बढ़ाई गईं, जबकि कुछ में कमी। व्यवसायियों से अधिक वसूली का निर्णय।

पर्यावरणीय स्वीकृति: कुमाऊं की चार नदियों (गौला, शारदा, दाबका, कोसी) में 5 वर्ष के लिए पर्यावरण मंजूरी। लेकिन भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में सख्ती।

निजी भूमि पर खनन: जिला मजिस्ट्रेट को अनुमति देने का अधिकार। पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि कटाई से निकलने वाली मिट्टी को खनन श्रेणी से बाहर रखा गया।

निगरानी: निजी कंपनियों को रॉयल्टी वसूली का अधिकार, लेकिन हितों के टकराव की आलोचना। नवंबर 2024 में ITI लिमिटेड को 95 करोड़ का अनुबंध मिला डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और अवैध खनन निगरानी के लिए।

3. हालिया अपडेट्स (2024-2025)

खनन से उत्तराखंड में राजस्व वृद्धि: अप्रैल-नवंबर 2024 में 650 करोड़ रुपये का राजस्व, जो पिछले वर्ष से दोगुना। पारदर्शी नीति से तीन गुना वृद्धि का दावा किया गया।

नीति में बदलाव: 2025 में मशीनों से नदी सफाई की अनुमति (हाईकोर्ट आदेश पर)। खनन क्षेत्र पुनर्परिभाषित और मानक सख्त करने की तैयारी। कैबिनेट में प्रस्ताव लंबित है।

न्यायिक हस्तक्षेप: पर्यावरणीय चिंताओं के कारण जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने बागेश्वर जिले में साबुन पत्थर खनन पर प्रतिबंध बरकरार रखा है। 2024 में सरकार ने खनन नीति विवाद में कानूनी चुनौती वापस ली।

पर्यावरण फोकस: भूस्खलन में (2900% वृद्धि) और वनों की कटाई के बीच खनन आसान बनाने पर विवाद। स्टार रेटिंग सिस्टम लागू।

4. चुनौतियां और सुझाव

चुनौतियां: अवैध खनन, पर्यावरण क्षति (भूस्खलन, नदी तल गहराई), माफिया प्रभाव। निजी कंपनियों को प्राथमिकता से हितों का टकराव।

सुझाव: डिजिटल निगरानी मजबूत करें, टिकाऊ खनन पर जोर। हितधारकों के सुझावों को शामिल कर ‘यूजर फ्रेंडली’ नीति बनाएं। हिमालय का विकास हिमालय की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप हो।