विपिन जोशी ..
उत्तराखंड, हिमालय की गोद में बसा यह राज्य, अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन यह भू-भौगोलिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यहां भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना और हिमनदी झीलों के फटने (GLOF) जैसी आपदाएं आम हैं, जो मानसून के दौरान और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही हैं। वर्तमान तिथि 8 सितंबर 2025 को, राज्य में मानसून से जुड़ी आपदाओं ने भारी तबाही मचाई है, खासकर अगस्त-सितंबर में। इन घटनाओं ने सैकड़ों लोगों की जान ली है, हजारों को प्रभावित किया है और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है। आइए विस्तार से समझते हैं।
वर्तमान आपदा का अवलोकन (अगस्त-सितंबर 2025)
मुख्य घटना: उत्तरकाशी का धराली आपदा (5 अगस्त 2025) उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में खीर गंगा नदी पर भारी बारिश और बादल फटने से फ्लैश फ्लड आया, जिसने गांव के बाजार, होटल, घरों और सेना कैंप को तबाह कर दिया। यह घटना गंगोत्री धाम की यात्रा मार्ग पर हुई, जहां मिट्टी, मलबा और पानी की भारी लहर ने सब कुछ बहा लिया।> मृतकों की संख्या 5 से अधिक है, जबकि 50-100 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें 11 भारतीय सेना के जवान शामिल हैं। भारत मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यह GLOF या हिमनदी झील फटने का परिणाम हो सकता है, न कि केवल बादल फटना।
अन्य प्रभावित क्षेत्र, रुद्रप्रयाग भूस्खलन से बसुकेदार क्षेत्र में बड़े बोल्डर गिरे, जिससे सड़कें अवरुद्ध हो गईं।
बागेश्वर : 29 अगस्त को पौंसारी गांव में भारी बारिश से 5 घर दब गए, 5 लोगों की मौत।
चमोली, पौड़ी, नैनीताल, भूस्खलन और बाढ़ से सड़कें, पुल और बिजली व्यवस्था प्रभावित।
हरिद्वार : भिमगोड़ा के पास डाट काली मंदिर के निकट रेल पटरियां अवरुद्ध हो गईं।
कुल प्रभाव जून से 5 अगस्त तक 48 मौतें, लेकिन पूरे मानसून में 100+ मौतें। 1,300+ लोग बचाए गए, लेकिन 66+ अभी भी लापता। चार धाम यात्रा प्रभावित, सड़कें अवरुद्ध। राज्य सरकार ने 5,702 करोड़ रुपये की विशेष सहायता मांगी है।
कारण: प्राकृतिक और मानवीय कारक
उत्तराखंड की आपदाएं केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों से बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक हिमालय नया और नाजुक है। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे GLOF और बाढ़ बढ़ रही हैं। मानसून 2025 में 2022 के बाद सबसे घातक रहा, जहां 66 दिनों में 43 दिन चरम मौसम दर्ज।<
– **मानवीय**: अनियोजित निर्माण (होटल, सड़कें), चारधाम यात्रा के लिए पहाड़ काटना, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यटन दोहन। धराली का बाजार नदी के पुराने मार्ग पर बना था, जो 1835 की बाढ़ के सिल्ट पर था। ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट से पहाड़ों की कटाई ने जोखिम बढ़ाया।< > आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट में रुद्रप्रयाग सबसे संवेदनशील जिला बताया गया।<
पिछली घटनाएं (2013 केदारनाथ, 2021 चमोली) से सबक न लेने से तबाही बढ़ी।
राहत और बचाव कार्य
सरकारी प्रयास**: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना, आईटीबीपी और बीआरओ सक्रिय। 190+ लोग हेलीकॉप्टर से बचाए गए। देहरादून में 13 लंबे रेंज वाले सायरन लगाए गए (8-16 किमी रेंज)। केंद्रीय टीम (गृह मंत्रालय के नेतृत्व में) 6 जिलों का दौरा कर रही है।
अन्य सहायता : यूपी से 48 ट्रक राहत सामग्री (योगी आदित्यनाथ द्वारा)। राजस्थान से 5 करोड़ रुपये। पीएम मोदी 11-12 सितंबर को हवाई सर्वे करेंगे।
चुनौतियां**: लगातार बारिश और अवरुद्ध सड़कें बचाव में बाधा।
भविष्य की रोकथाम के उपाय
प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली : अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करें, इंटरनेट नेटवर्क सुधारें।
विकास मॉडल : संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण प्रतिबंधित करें। वन संरक्षण, जैव-इंजीनियरिंग और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन।
नीतिगत : सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों पर अमल, जैसे हाई कोर्ट की निगरानी में डैम निर्माण। स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण दें।
जलवायु कार्रवाई : ग्लेशियर मॉनिटरिंग बढ़ाएं, क्योंकि हिमालय ग्लोबल वार्मिंग से सबसे प्रभावित।
उत्तराखंड की ये आपदाएं हमें चेतावनी दे रही हैं कि विकास और पर्यावरण का संतुलन जरूरी है। सरकार और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा।





