नंदा देवी के जेवर अनसुनी कहानी

विपिन जोशी …

चंद वंश ने जताया था भगरतोला के बोरा लोगों पर भरोसा।

सदियों से बोरा लोग निभा रहे हैं नंदा देवी के जेवर सहजने की जिम्मेदारी।

चंद वंशी राजाओं ने भगरतोला के बोरा लोगों पर जताया भरोसा। सौंपे थे देवी के जेवर। तब से अब तक जेवरों की देखभाल बोरा लोग करते आ रहे हैं। बोरा लोगों को चंद वंशी राजा ने कोट भ्रामरी नंदा देवी के जेवर रखने की जिम्मेदारी दी। मेले के छोटी जागरण में तहसील प्रशासन की सुरक्षा में जेवर देवनाई भगरतोला से कोट मंदिर लाए जाते हैं। मेला समापन के बाद जेवर पुनः भगरतोला पहुंचाए जाते हैं।

मेले का प्राचीन दौर – प्राचीन मान्यता के अनुसार कोट भ्रामरी मंदिर के आसपास कत्यूर घाटी में पूर्व में एक विशाल झील थी। इस झील में रणु राकस नाम का राक्षस निवास करता था। उसके आतंक से सभी दुखी थे। लोगों ने मिलकर मां भगवती की प्रार्थना की मां भगवती ने असंख्य भ्रमरों का रूप धारण कर राक्षस को विषैले डंको से काट कर उसका वध किया। कोट भ्रामरी नाम भी तभी से पड़ा इसी स्थान में भगवती ने भ्रमर रूप धारण किया था। तब के समकालीन राजा ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया, कोट अर्थात किला। तब से इस स्थान को कोट भ्रामरी नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर में ओखली के आकार का एक शिला खण्ड भी मौजूद है इसे घटूली कहते हैं मान्यता है कि इसमें देवी अपने गणों के साथ निवास करती है। इस घटूली की गहराई कोई अंत नहीं है। घटूली में बलि का खून चढ़ाया जाता था, अब कोट भ्रामरी मंदिर में बलि प्रथा बंद हो गई है। एक अन्य मान्यता के अनुसार हिमालय पुत्री मां पार्वती, मां नंदा का इतिहास भी उक्त से जोड़ा जाता है। मां पार्वती आदि शक्ति भगवती के रूप में यहां पूजी जाती है। भादौ की अष्टमी में यहां तीन दिवसीय मेला लगता है। प्राचीन परंपरा के अनुसार आज भी भादौ की अष्टमी में यहां ननौल, भगनौल जागर आदि का गायन रात भर किया जाता है। गेवाड़, दानपुर, अल्मोड़ा आदि के लोग जागर गायक आज भी भ्रामरी मेले में आकर रात भर जागर गायन करते हैं। आशु कविता पर आधारित भगनौल गायकी त्वरित सवाल जवाब पर आधारित मनोरंक संगीत मयी विधा है, हुड़के की थाप पर यह और भी मोहक हो जाती है।

रतन सिंह किरमोलिया – तैलीहाट के तिवारी लोगों में से किसी एक के शरीर में देवी का अवतरण होता है। पूर्व में देवी मुंह में कटार लेकर अलग अलग पहर में देवी जागर गाथा के साथ मंदिर परिसर में अवतार लेकर नाचती थी और मंदिर परिसर में भैंसे की बलि दी जाती थी। सैकड़ों की संख्या में बकरों की बलि चढ़ाई जाती थी वक्त के साथ कोट भ्रामरी मंदिर में बलि प्रथा पर कोर्ट ने रोक लगा दी। नंदा देवी के समस्त स्वर्ण आभूषण देवनाई के बोरा लोगों के घर पर सुरक्षित रखे जाते हैं। तहसील प्रशासन पूरी सुरक्षा के साथ मेले से पूर्व देवी के जेवरों को मंदिर तक लाता है। तत्पश्चात पुजारी उचित मुहूर्त में देवी को आभूषणों से सुसज्जित करते हैं। मेले को यथावत संचालित करने में मेला डुगंरी के भंडारी, जखेड़ा के परिहार, देवनाई के बोरा लोगों का बड़ा योगदान रहता है। नंदा देवी के पुजारी के रूप में तैलीहाट के तिवारी लोग सेवा देते हैं। तैलीहाट के पुजारियों के पास कोट भ्रामरी मंदिर के पुराने तामपत्र प्रमाण के रूप में आज भी मौजूद हैं।

 भ्रामरी में नंदा और भ्रामरी माता की पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार भ्रामरी शक्ति स्वरूपा है उनकी पीठ पूजा की जाती है और नंदा पूर्ण श्रृंगार रूप में प्रतीमा रूप में पूजी जाती है। कदली वृक्ष से नंदा की प्रतीमा बनाई जाती है और मेले के समापन अवसर पर प्रतीमा का विसर्जन किया जाता है। कदली वृक्ष वज्यूला के पास मवाई ग्राम से लाया जाता है। इसकी बड़ी रोचक मान्यता है। नंदा देवी असुर से बचती हुई मवई पहुंची और कदली वृक्ष के पीछे छुप गई। कदली वृक्ष हिला और असुर ने नंदा को देख लिया। तब से कदली वृक्ष यहीं से काटा जाता है। बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन को देखने आते हैं। नंदा देवी तैलीहाट के तिवारी पुजारी के शरीर में अवतार लेकर स्वयं कदली वृक्ष को काटने जाती है। इसी कदली वृक्ष से नंदा सुनंदा के डिकरे बनाए जाते हैं।

आज का मेला – सोलर लाइट, बड़े शामियाने, आकर्षक मंच, ऑरकैस्टा, स्टार नाईट, सीसीटीवी कैमरे, दुकानें, भन्डारा, विभागों के स्टाल। लाइव प्रसारण, इन सबने मेले का स्वरूप बदल दिया। नहीं बदली तो देवी अवतरण जागर गायन की विधा, देवी के पहर, कदली वृक्ष परंपरा। मेला चाहे जितना आधुनिक हो जाए लेकिन आस्था नहीं बदलती। कोट भ्रामरी मंदिर की एक और आस्था वाली मान्यता है दियारी मेला चैत में लगने वाला दियारी मेला निःसंतान दंपतियों के होता है। रात भर महिलाए जलता दिया हाथ में लेकर खड़ी रहती हैं और संतान प्राप्ति की कामना करती हैं अब तक किसी भी दंपती को निराशा नहीं हुई है। यह मान्यता का विशाल स्परूप है।

 1998 से मेला विधिवत नए मंच के रूप में मेला समिती के गठन के साथ प्रति वर्ष मनाया जाने लगा। पहले मेला तीन साल में एक बार संचालित होता था। पुराने डांक बंगले में गढ़वाल और कुमांउ के पेंशनरों को पेंशन वितरित होती थी काफी लोग एकत्र होते थे और कम संसाधनों के साथ मेला आयोजित किया जाता था। मेला डुगंरी के भंडारी, जखेड़ा के परिहार, देवनाई के बोरा लोगों की कुलदेवी के रूप में नंदा देवी की मान्यता है तो इन्होने मेले को प्रति वर्ष बारी-बारी से संचालित करने की पंरपरा बनाई इस तरह एक साल प्रशासन तो अगली बार समुदाय ने मेला आयोजन की जिम्मेदारी ली। तब से मेला सतत रूप से संचालित हो रहा है।