गोरी पार से मुनस्यारी को देखना

मंजु पांगती, शिक्षिका जीपीएस ग्वालदम 

गोरी नदी के दोनों ओर खड़ी पहाड़ियां जिसमें अनेक गांव बसे हुए हैं गोरी वार जिसे मुनस्यारी नाम से जाना जाता है। और गोरी पार को गोरी पार कह कर जाना व पुकारा जाता है। गोरी पार जाने के लिए पूर्व के दिनों में पैदल यात्रा करनी पड़ती थी इस लिए गोरी पार जाने की कल्पना करना भी मुमकिन नहीं था। अपने घर से गोरी पार के गांवों को निहारते हुए हम ने बचपन और जवानी बिता दी।

कोई कारण नहीं था कि हम वहां जाएं और घूम आएं। अनेकों बार मन में ख्याल आता कि गोरी पार से मुनस्यारी कैसा दिखता होगा,! और फिर वह खयाल उसी तीव्रता से कहीं गुम हो जाता। हमने बचपन में गोरी पार के जंगलों में जलती हुई आग की रेखाएं देखीं जो अनेक प्रकार की आकृतियां बना लेंती। वह कौतूहल का विषय बन जाया करती। बाद के दिनों में उन जलती आग का रहस्य समझ में आया।

वर्तमान समय में गोरी पार बिजली के दुधिया प्रकाश की जगमगाहट से नहाया हुआ दिखाई देता है। अनेकों गांव सड़क से जुड़ गए हैं । गोरी पार का चुलकोट धार इन दिनों काफी चर्चा में है, वहां से पंचाचूली की हिमश्रृंखलाएं और करीब से दिखाई देती हैं। कुछ वर्ष पहले वहां पर पैराग्लाइडिंग की गई थी इसी वजह से यह जगह चर्चा में आई थी। मेरे मन में एक दबी हुई चाहत पैदा हो गई कि एक बार तो चुलकोट जाना ही है, लेकिन कब ?  इस बात की कोई स्पष्टता नहीं थी।

इस बार जून माह में मुझे अवसर मिला, मेरी मुराद पूरी हो रही थी,तो मैं इस अवसर को कैसे गवां सकती थी झट से तैयार हो गई। और पहुंच गई बंजीखडक। साथ में दीदी और उनकी बेटी थी। दरअसल मैं उनके साथ यहां पहुंची। यह उनके पुश्तैनी मित्र का गांव है जो उनकी बकरियां चराते व पालते हैं। तिब्बत व्यापार में बकरियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। उस रस्म को जीवित रखने के उद्देश्य से आज भी उन्होंने अपनी बकरियां रखीं हैं बशर्ते बकरियां कम हैं लेकिन बकरियों के साथ-साथ उनकी आपसी मित्रता आज भी कायम है। अपनी मित्रता को और मजबूत करने के लिए आपस में मेल- मिलाप होना भी एक जरूरी पक्ष है।

चुलकोट से और आगे भैंसखाल तक सड़क पहुंच गई है, यहां से करीब एक किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई थी बारिश शुरू हो गई और जोंक (लीच) के आक्रमण को झेलते हुए हम मित्र के घर शाम छः बजे पहुंचे। साथ में उनकी बेटी थी जो मुनस्यारी से हमारे साथ आई। बंजीखडक उस पहाड़ी का अंतिम गांव है उसके ऊपर बड़े -बडे पत्थरों और छोटी घास वाली पहाड़ी खड़ी थी। वहां से पंचाचूली का दृश्य और करीब से दिखाई देता है यह बात उन्होंने कही। अगले दिन उस पहाड़ी पर जाने का प्रोग्राम हमने बना लिया। अंधेरा घिरने लगा और सामने जगमगाती पहाड़ी का दृश्य दिखाई दिया वह था मुनस्यारी। हम अपने घर को ढूंढने में व्यस्त हो गए और हमने अपना घर ढूंढ निकाला। अब मच्छरों का आक्रमण शुरू हो गया था इस लिए ममता ने गोबर के उपलों को सुलगा दिया जिससे मच्छर भाग गए। पहाड़ों में मच्छर भगाने का यही तरीका होता है।

चाय पीने के बाद हम बाहर आंगन में टहलते हुए घर के लोगों से बतियाते रहे उनके आत्मीय व्यवहार की गर्माहट हमें पिघलता रही थी कितना सुखद एहसास था । दो बुग्याली कुत्तों के गले में बंधी घंटियों की आवाज उस शांत वातावरण में संगीत पैदा कर रही थी। वो हमारे करीब आते और हम डर कर दो कदम पीछे हट जाते । ढेरों बातें करते हुए हमने भोजन किया। भोजन में परोसी गई काले जौं की रोटी और घी,जो ‍बेहद पौष्टिक एवं स्वादिष्ट थी हमने काले जौं की रोटी पहली बार खाई और उनके बारे में जाना ।इसके अतिरिक्त सब्जी, पूरी, सिंवयीं और ताजा मठ्ठा ।

अगली सुबह नाश्ता कर के हम चल दिए धार परि धार ,मतलब पहाड़ी की चोटी पर वहां से पंचाचूली देखने का इरादा था मौसम बहुत साफ नहीं था फिर भी उम्मीद कर रहे थे कि शायद हमें वो नजारा देखने का अवसर मिल जाए। हमारे मेजमान थे नेगी परिवार । तीन भाइयों के परिवार में सबसे छोटे भाई के पास दीदी लोगों की बकरियां थी लेकिन खातिर दारी तीनों परिवार कर रहे थे।
हमारे साथ उनकी दो बेटियां भी थी । डेढ़ घंटे में हम पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए, यहां से दो -तीन किलोमीटर और आगे ये लोग घास काटने जाया करते हैं। हिमालय से बादल तो नहीं हटे लेकिन हम प्रकृति का आनंद लेते हुए घंटे भर यहां बैठे रहे। यहां से पूरा मुनस्यारी दिखाई दे रहा था ,हरकोट,इमला के अतिरिक्त अनेक गांव साफ दिखाई दे रहे थे डांडा धार भी। हमारे दाहिने ओर दुम्मर तक का नजारा दिखाई दे रहा था। उस धार में बैठे हुए मैं सोच रही थी बचपन की ख्वाहिश अब पूरी हुई और हम धीरे-धीरे नीचे उतर आए। खाना तैयार था और भूख भी लग रही थी खा-पीकर हम सो गए।

शाम को गांव की औरतें हमसे मिलने आ पहुंची दीदी डॉक्टर है इस लिए वे अपनी -अपनी छोटी -बड़ी बीमारियों की बातें करने लगी। चौदह-पंद्रह परिवारों वाला यह छोटा सा दूरस्थ गांव है यहां से मात्र दो परिवारों ने पलायन किया है शेष अपने घर में संतुष्ट हैं सिर्फ अस्पताल की कमी उन्हें अखरती है। स्कूल जरा दूर है जौंलठुंग में लेकिन वे संतुष्ट नजर आए। पहाड़ों में चढ़ना उतरना उनके रोजमर्रा के दैनिक कार्यों में शामिल हैं। आलू,राजमा ,काला जौं आदि की खेती करते हैं सभी लोग बकरी पालन से जुड़े हुए हैं साथ ही भांग की खेती भी करते हैं। इनके पास खेत अधिक नहीं है फिर भी जीविकोपार्जन के कुछ सूक्ष्म साधन तो हैं ही।

यहां से र् हालम ग्लेशियर के बुग्यालों में ये लोग अपनी बकरियां चराने जाते हैं,और जिनके पास अन्य शौकाओ की बकरियां होती हैं वे र् हालम ग्लेशियर से होकर उनके गांवों के बुग्यालों में बकरी चराने जाते हैं। तीसरे दिन हमने मुनस्यारी के लिए वापसी की फिर से अक्टूबर माह में आने का वादा कर उनसे विदा ली।