हिमालय का विकास बनाम आपदा

विपिन जोशी, स्वर स्वतंत्र 

चमोली जनपद के राडीबगड़ मार्केट, थराली मार्केट, सगवाड़ा गांव और चेपड़ो में बादल फटने से भारी नुकसान हुआ. राडीबगड़ में उपजिलाधिकारी आवास समेत तीन दर्जन मकान और एक दर्जन गाड़ियां क्षतिग्रस्त हुईं। थराली में 40 से ज्यादा घरों में मलवा घुसा, जबकि सगवाड़ा में मकान गिरने से एक युवती की मौत हो गई. 

आपदा के बाद थराली में मुख्यमंत्री धामी का दौरा हो चुका है. आपदा प्रभावित लोगों से मुख्यमंत्री मिल चुके है. देहरादून में प्रेस वार्ता भी हुई है.

थराली आपदा पर प्रशासन सरकार क्या कह रही है ? सीएम धामी हिमालय के विकास पर क्या नजरिया रखते हैं? कैसा हो हिमालयन विकास माडल? शोशल मीडिया में मेरी एक पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों से समझते हैं,

कपकोट से पूर्व शिक्षक चंद्र सिंह बघरी लिखते हैं.

हिमालय का अनियोजित अनियंत्रित व अवैज्ञानिक तरीके से विकास हो रहा है उसका परिणाम दिखाई दे रहा है, सड़क निर्माण के लिए बहुत तेज गति से निर्माण, भारी मशीनों का प्रयोग, बहुत अधिक मात्रा में एक्सप्लोसिव का प्रयोग पहाड़ों के स्टैक्चर को बहुत कमजोर कर रहा है, साथ ही वायुमंडल को भी प्रभावित कर रहा है, यह सब गतिविधियां आपदा के लिए जिम्मेदार हैं,भले ही समय लगे पर यहां पर चट्टानों को मैनुवली काटा जाय कम पावर की मशीनों का उपयोग हो जिससे पहाड़ भूस्खलन की संभावना न हो, जरूरत से अधिक चौड़ी सड़कें न बनाई जाँए अगर संभव हो तो सड़कें सिंगल हों भले ही आने और जाने के लिए अलग सड़कें हों इसके लिए नदी के दोनों किनारों का उपयोग हो सकता है.

गरुड़ से पूर्व शिक्षक व साहित्यकार रतन सिंह किरमोलिया ने कहा विकास के नाम पर विनाश का खेल जारी है। पूर्व शिक्षक सुरेंद्र वर्मा सुंदर ने एक पंक्ति में सच लिखा कि तहस नहस करने वाला विकास है।

वरिष्ठ पत्रकार शुशील बहुगुणा की एक पोस्ट सोशल मीडिया में वायरल हो रही है बहुगुणा लिखते हैं कि उत्तरकाशी धराली की तरह चमोली का थराली भी आपदा का इंतजार कर रहा था। यह आपदा इससे भी बड़ी हो सकती है, क्योंकि थराली नीचे पिंडर नदी, ऊपर प्राणमति नदी, और पहाड़ी पर भूस्खलन से आए मलवे के ढेर पर बसा है। ये तीन तरफा फायदा कभी भी, तीन तरफा मार में तब्दील हो सकता है। इसका ट्रेलर बीती रात यहां दिख चुका है। संभलने का जितना वक्त हैं उसका इस्तेमाल कर लिया जाना चाहिए।

धराली, थराली में हुए विकास के बाद आपदा से हुए नुकसान ने एक बात तो स्पष्ट कर दी है कि हिमालय क्षेत्र में भारी निर्माण करना और पहाड़ों से छेड़ छाड़ करना घातक हो सकता है बावजूद इसके बड़े निर्माण के साथ पहाड़ में सुरंग बाध और सुरंग रेल लाइन का निर्माण धड़ल्ले से किया जा रहा है . कितना अजीब दृश्य है विकास का ढोल बजा रही जनता इसी पहाड़ के मलवे में दब खप जाती है और इसी विनाशकारी विकास की चाहत में धरने प्रदर्शन रैलियां करती है. अवैज्ञानिक विकास की पैरवी करने वाले उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों को खा के महानगरीय सभ्यता का लुत्फ़ लेते हैं और पहाड़ के लोग पहाड़ में ही समाधि लेते देखे जा सकते हैं. ऐसी परंपरा बनी हुई है। प्राकृतिक आपदाओं को रोका जाना संभव नहीं है पर सुनियोजित विकास के माडल से आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू में हालिया आपदाओं ने हिमालयी क्षेत्र में विकास के समूचे मॉडल पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उक्त आपदाओं की समीक्षा होने लगी है। केदारनाथ आपदा के बाद धराली फिर थराली की तबाही बड़े संकेत देती है कि चेत जाओ नदी के किनारे बड़े निर्माण मत करो। जितनी भी आपदाएं अभी तक आई हैं उनमें नदी के किनारे बसे इलाके सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। पानी के साथ बह कर आया मलवा नुकसान का बड़ा कारण बन रहा है। केदार नाथ आपदा भी झील के टूटने से हुई और धराली की आपदा में ग्लेशियर पर झील के टूटने से हुई। बढ़ती भौगोलिक अस्थिरता और ग्लोबल वार्मिंग हिमालय में एवलांच और उससे उपजी आपदा के रूप में कहर बन कर सामने आती है।

आखिर नगरीय सभ्यता के लोभ में धराली में नदी के किनारे बसने की होड को सरकारों ने भी आंख मूंद कर इजाजत क्यों दे दी ? पूर्व की आपदाओं से सबक लिया होता तो धराली त्रासदी में इतना जान माल का नुकसान नहीं होता। और शायद चमोली के थराली में भी न्यूनतम नुकसान होता। लेकिन सरकारें सबक कहा लेती हैं ?

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