विपिन जोशी..
आजादी के दशकों बाद भी ‘डोली’ के भरोसे जिंदगी: दरणा गाँव में सिस्टम की विफलता की दर्दनाक तस्वीर.
बागेश्वर। डिजिटल इंडिया और ‘हर गाँव सड़क’ के दावों के बीच उत्तराखंड के बागेश्वर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो शासन-प्रशासन के दावों की पोल खोलती है। गरुड़ ब्लॉक के दरणा गाँव में सड़क न होने के कारण एक 78 वर्षीय बीमार बुजुर्ग महिला को ग्रामीणों ने जान जोखिम में डालकर ‘डोली’ के सहारे मुख्य मार्ग तक पहुँचाया।

5 किलोमीटर का ‘मौत का सफर’
कोट्टुलारी ग्राम पंचायत का दरणा गाँव, जिसमें करीब 50 परिवार रहते हैं, आज भी विकास की बाट जोह रहा है। 78 वर्षीय देवकी देवी बीते 28 मार्च से गंभीर रूप से अस्वस्थ थीं। गाँव में पर्याप्त लोगों की कमी और सड़क न होने के कारण उन्हें तत्काल अस्पताल नहीं ले जाया जा सका।
अगली सुबह, ग्रामीणों ने साहस जुटाया और उन्हें डोली में बैठाकर 5 किलोमीटर लंबे दुर्गम और फिसलन भरे पहाड़ी रास्ते से पैदल तय कर नीचे पहुँचाया। पिरूल (चीड़ की पत्तियों) से ढके इस ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर एक मामूली सी चूक जानलेवा साबित हो सकती थी। प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर हालत देखते हुए उन्हें हल्द्वानी रेफर कर दिया गया है।
2014 से फाइलों में दबी है सड़क
ग्रामीणों का आक्रोश चरम पर है। पूर्व ग्राम प्रधान राजेंद्र किरमोलिया का कहना है कि सड़क की फाइल साल 2014 से लंबित पड़ी है। चुनाव आते ही जनप्रतिनिधि वादों की झड़ी लगा देते हैं, लेकिन वोट पड़ते ही गाँव की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। “हमें सालों से केवल झूठे आश्वासनों के सहारे रखा गया है। यह हमारे साथ सरासर अन्याय है।” – राजेंद्र किरमोलिया, पूर्व ग्राम प्रधान
प्रशासन पर उठते गंभीर सवाल
मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर दूर होने के बावजूद इस गाँव की उपेक्षा कई सवाल खड़े करती है:
* क्या 21वीं सदी में भी पहाड़ की नियति ‘डोली’ ही रहेगी?
* 2014 से लंबित सड़क की फाइल आखिर किस दफ्तर की धूल फांक रही है?
* क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
दरणा गाँव की यह स्थिति चीख-चीख कर कह रही है कि पहाड़ों में विकास केवल कागजों तक सीमित है। अब देखना यह है कि इस खबर के बाद शासन-प्रशासन की नींद टूटती है या दरणा के लोग यूँ ही अपनी किस्मत और ‘डोली’ के भरोसे छोड़ दिए जाएंगे।




