पहाड़ियों में गूंजती हुड़के की थाप

विपिन जोशी,स्वर स्वतंत्र

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उत्तराखंड की देवभूमि परंपरा में कुमाऊं क्षेत्र की जोन्यार और जागर संस्कृति केवल लोक मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था, मनोविज्ञान और समाज के अटूट बंधन का जीवंत प्रमाण हैं। यहाँ की पहाड़ियों में गूंजती हुड़के की थाप और काँसे की थाली की गूँज सीधे पूर्वजोंऔर देवताओं से संवाद करने का माध्यम मानी जाती है। गरुड़ में लोबांज, मोतिस्यारी, शांति बाज़ार में नवरात्रि के अवसर पर ज्योनार का आयोजन किया गया है। लोबांज कालिका मंदिर में 26 साल बाद तो मोतिस्यारी में 70 साल बाद ज्योनार का आयोजन किया गया है। सात दिवसीय ज्योनार का समापन 26 मार्च को महा भंडारे के साथ होगा

लोबांज में मुख्य देव डांगर हैं प्रधान दीपू कोरंगा, गोपाल सिंह कोरंगा, गोपाल दत्त मिश्रा, अशोक कोरंगा, गिरीश कोरंगा, महेशकोरंगा,

‘मुख्य डांगर दीप कोरंगा ने बताया कि सभी लोक देवताओं का अवतरण होता है । कष्टों के निवारण के लिए स्थानीय देवताओं (जैसेगोलू देवता, काली, हरज्यु, हनुमान,गंगनाथ, भोलनाथ, सैम)

जगरिया वह मुख्य गायक जो पौराणिक गाथाएं और देवताओं की स्तुति गाता है। वह हुड़का या डौंरथाली बजाने में निपुण होता है।वह व्यक्ति जिसके शरीर में देवताअवतरितहोते हैं। जब संगीत और मंत्रों का प्रभाव चरम पर होता है, तो डंगरिया भावविभोर होकरनाचने लगता है।

गिरीश कोरंगा – कुमाऊंनी जागरों में प्रयोग होने वाली शब्दावली और स्वर विज्ञान इतना जटिल और समृद्ध है कि इसे अब संगीतशास्त्र के विद्वानों द्वारा भी सराहा जा रहा है । आज के आधुनिक दौर में जब पलायन एक बड़ी चुनौती है, ये सांस्कृतिक विरासतें हीप्रवासियों को अपनीमाटीकी खुशबू से जोड़े रखती हैं।

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