विपिन जोशी..
सात साल बाद ग्वालदम में पड़ी बर्फ।
मौसम विभाग का अनुमान लगभग सटीक साबित हुआ है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, एक सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) उत्तर भारत में प्रभावी है, जिसके चलते 22 जनवरी 2026 से उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी शुरू हुई। 23 जनवरी 2026 को चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था, जहां 2800 मीटर से अधिक ऊंचाई पर भारी बर्फबारी की संभावना बताई गई। ग्वालदम (चमोली जिला) सहित कपकोट, चंबा (टिहरी), मुनस्यारी आदि इलाकों से इस सीजन की पहली उल्लेखनीय बर्फबारी की खबरें आईं। यह बर्फबारी कई इलाकों में पिछले कई सालों की तुलना में देर से आई है—कुछ रिपोर्ट्स में सात साल बाद ग्वालदम में ऐसी स्थिति का जिक्र है।
विगत छह माह सूखे से गुजरते हुए भी देखे, गेहूं की फसल को सिंचाई के लिए तरसते भी देखा। एक ओर उत्तराखंड के जंगलों में आग लगी—जनवरी 2026 के पहले तीन हफ्तों में ही राज्य में 440 से अधिक वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गईं (जबकि पिछले साल इसी अवधि में सिर्फ 45 थीं), दूसरी ओर जनवरी में बुरांश (रhododendron arboreum) को खिलते भी देखा—जो सामान्यतः मार्च-अप्रैल में फूलता है, लेकिन बढ़ते तापमान और अनियमित मौसम के कारण अब जनवरी में भी प्रचुर मात्रा में खिल रहा है। यह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
लेकिन आज 23 जनवरी को दोपहर बाद से मौसम ने करवट बदली। हल्की बूंदाबांदी ने तेज बौछारों का रूप लिया और उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सीजन की पहली बर्फबारी शुरू हुई। कपकोट, चम्बा टिहरी, ग्वालदम, मुनस्यारी से बर्फ़वारी का अपडेट वाया इंटरनेट आने लगा।
तसल्ली इस बात की थी कि इस लेट लतीफी बारिश के आगमन से हमारे जंगल तो बुझ गए, फसलों को राहत मिलेगी, जल स्रोत भी तर होंगे। धरती का आसमानी बारिश से तृप्त होना हमारे लिए किसी वरदान से कम नहीं है। वैश्विक ताप ने बारिश के पैटर्न को जरूर प्रभावित किया है—पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में बर्फबारी और सर्दियों की वर्षा में कमी देखी गई है, जिससे सूखा, वनाग्नि और फसलों पर असर पड़ा। लेकिन धरातल पर सिर्फ और सिर्फ इंसान ही बदलते मौसम चक्र को संतुलित करने में अपनी भूमिका दे सकता है, यह अकाट्य सत्य है।
प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर नियंत्रण कौन करेगा?
वैश्विक कार्बन फुट प्रिंट पर कौन देश सबसे पहले नियंत्रण करेगा?
वनों को काटने में न्यूनतम पहल कौन देश लगाएंगे?
विकास के नाम पर बेइंतहा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कौन नियंत्रित करेगा?
सवाल दर सवाल निकलते जायेंगे। शायद इन सवालों के इतर कोई ठोस जवाब भले ना हो लेकिन प्रकृति के साथ समन्वय का रास्ता तो यहीं से निकलेगा—स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सतत विकास और कार्बन उत्सर्जन कम करने की व्यक्तिगत प्रतिबद्धता से।





