मौसम की बेरूखी और किसान

विपिन जोशी.

गरुड़ , कत्यूर घाटी में गेहूं की फसल बारिश न होने के कारण सूखने की कगार पर पहुँच गई है और किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
कत्यूर घाटी के अधिकांश गेहूं के खेत असिंचित (सिर्फ बारिश पर निर्भर) हैं, जहाँ सिंचाई के साधन सीमित हैं।
पिछले तीन-चार महीनों में बारिश लगभग नहीं होने के कारण मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं बनी रह पाई।
इसी वजह से गेहूं के पौधों में जल की कमी के लक्षण दिख रहे हैं और कई जगह फसल सूखने की कगार पर पहुँच चुकी है।
क्या असर हो सकता है:
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि गेहूं की पैदावार में 40 % तक कमी आ सकती है अगर बारिश जल्दी नहीं होती।
अन्य रबी फसलें जैसे सरसों, मसूर, और दाल भी प्रभावित हो सकती हैं।
बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिलों में अधिकांश खेती बारिश पर निर्भर है, और सर्दियों में बारिश न होने से मिट्टी की नमी कम हो जाती है।
जनपद बागेश्वर की कत्यूर घाटी में दिसंबर के अंतिम सप्ताह में गेहूं के काश्तकारों की चिंताएं गहरी हो गई हैं। इंद्र देव की नाराजगी थमने का नाम नहीं ले रही। मानसून के बाद वर्षा नहीं होने के कारण सूखे की छाया मंडरा रही है, और रबी की प्रमुख फसल गेहूं पर संकट के बादल घिर आए हैं। सिंचाई सुविधाओं के अभाव में मालदे, गगरीगोल,देवनाई, भिलकोट और लाहुर घाटी के सैकड़ों किसान हताश हैं। मौसम विभाग के अनुसार, राज्य के सभी जनपदों में शुष्क मौसम जारी है, और अगर अगले 7-10 दिनों में बारिश न हुई तो फसल की उपज में 30-50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। यदि हालात यथावत रहे, तो न केवल फसल बर्बादी होगी, किसानों को भारी नुकसान होगा।

46 वर्षीय किसान लाल सिंह (मज़ार चौरा गांव) ने बताया, “नवंबर में बुवाई पूरी की थी, लेकिन अब पौधे पीले पड़ रहे हैं। फ्लावरिंग का समय है, पानी न मिला तो अबकी बार गेहूं उत्पादन में गिरावट आ सकती है। पहले दिसंबर में हल्की बर्फबारी या बारिश फसल को राहत देती थी,
आयारतोली केप्रधान कैलाश पवार ने कहा, “नदी का पानी सूख गया है। ड्रिप इरिगेशन लगाने की योजना थी, लेकिन संसाधनों की कमी है, जिला प्रशासन से मुआवजे और बीमा दावों की उम्मीद है।”
चन्द्र शेखर पांडे, किसान, चोरसो
बारिश अनियमित हो गई है, मौसम चक्र में भी बदलाव आया है। सरकार को कृषि नीतियों में बदलाव करने की आवश्यकता है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग से बर्षा जल को संग्रहित कर बाद में उपयोग किया जा सकता है। या टिहरी में किए जा रहे सिंचाई प्रयोगों से भी सीखा जा सकता है। बारिश समय पर नहीं हुई तो इस बार किसान भारी नुकसान उठाएंगे।

डॉ. राज कुमार, विशेषज्ञ (कृषि विज्ञान केंद्र)ने जानकारी दी, “गेहूं की फ्लावरिंग स्टेज में जल की कमी से पौधों का विकास ठप हो जाता है। पानी की कमी और सूखे का संयोजन फसल को कमजोर कर देता है, अभी गेहूं के लिए सिंचाई की बहुत जरूरत है। गर्म घाटियों में तो गेहूं इस वक्त पीला पड़ने लगा है। यदि सप्ताह भर में वर्षा नहीं हुई तो गेहूं के उत्पादन में भारी गिरावट हो सकती है। किसानों को स्प्रिंकलर और मल्चिंग तकनीक की सलाह दी जा रही है।
जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में वर्षा का पैटर्न प्रभावित हुआ है। पहले अक्टूबर-दिसंबर में 2-3 बार हल्की बर्फबारी होती थी, जो मिट्टी को नमी प्रदान करती थी। अब अनियमित मौसम, बढ़ते तापमान (दिसंबर में 8-26 डिग्री सेल्सियस) और सूखे की घटनाएं आम हो गई हैं। इसका प्रभाव उत्पादन में भी दिखेगा।
विपिन जोशी,