विपिन जोशी..
बारिश की बेरुखी से गेहूं काश्तकार संकट में
गरुड़ (कत्यूर घाटी)
जनपद बागेश्वर की कत्यूर घाटी में दिसंबर का दूसरा सप्ताह शुरू होते ही गेहूं के काश्तकारों की चिंताएं गहरी हो गई हैं। इंद्र देव की नाराजगी थमने का नाम नहीं ले रही। मानसून के बाद वर्षा नहीं होने के कारण सूखे की छाया मंडरा रही है, और रबी की प्रमुख फसल गेहूं पर संकट के बादल घिर आए हैं। सिंचाई सुविधाओं के अभाव में मालदे, तेलीहाट, देवनाई, भिलकोट और लाहुर घाटी के सैकड़ों किसान हताश हैं। मौसम विभाग के अनुसार, राज्य के सभी जनपदों में शुष्क मौसम जारी है, और अगर अगले 7-10 दिनों में बारिश न हुई तो फसल की उपज में 30-50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। यदि हालात यथावत रहे, तो न केवल फसल बर्बादी होगी, किसानों को भारी नुकसान होगा।
कत्यूर घाटी, बागेश्वर जिले का एक महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र है, जहां विस्तार लिए सेरों तथा पहाड़ी ढलानों पर गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों की खेती आजीविका का आधार है। यहां के किसान मुख्य रूप से गूल सिंचाई और वर्षा जल पर निर्भर हैं। 46 वर्षीय किसान लाल सिंह (मज़ार चौरा गांव) ने बताया, “नवंबर में बुवाई पूरी की थी, लेकिन अब पौधे पीले पड़ रहे हैं। फ्लावरिंग का समय है, पानी न मिला तो अबकी बार गेहूं उत्पादन में गिरावट आ सकती है। पहले दिसंबर में हल्की बर्फबारी या बारिश फसल को राहत देती थी,
आयारतोली के कैलाश पवार ने कहा, “नदी का पानी सूख गया है। ड्रिप इरिगेशन लगाने की योजना थी, लेकिन संसाधनों की कमी है, जिला प्रशासन से मुआवजे और बीमा दावों की उम्मीद है।”
चन्द्र शेखर पांडे, किसान, चोरसो
बारिश अनियमित हो गई है, मौसम चक्र में भी बदलाव आया है। सरकार को कृषि नीतियों में बदलाव करने की आवश्यकता है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग से बर्षा जल को संग्रहित कर बाद में उपयोग किया जा सकता है। या टिहरी में किए जा रहे सिंचाई प्रयोगों से भी सीखा जा सकता है। बारिश समय पर नहीं हुई तो इस बार किसान भारी नुकसान उठाएंगे।
उत्तराखंड में 2025 की शुरुआत से ही चरम मौसम की घटनाएं, जैसे सूखा और अनियमित वर्षा, कृषि को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर-नवंबर में सामान्य से 70-80 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई, जो रबी फसलों के लिए घातक है। बागेश्वर में गेहूं का रकबा लगभग 10-12 हजार हेक्टेयर है, जिसमें कत्यूर घाटी का बड़ा योगदान है।
डॉ. राज कुमार, विशेषज्ञ (कृषि विज्ञान केंद्र)ने जानकारी दी, “गेहूं की फ्लावरिंग स्टेज में जल की कमी से पौधों का विकास ठप हो जाता है। पानी की कमी और सूखे का संयोजन फसल को कमजोर कर देता है, अभी गेहूं के लिए सिंचाई की बहुत जरूरत है। गर्म घाटियों में तो गेहूं इस वक्त पीला पड़ने लगा है। यदि सप्ताह भर में वर्षा नहीं हुई तो गेहूं के उत्पादन में भारी गिरावट हो सकती है। किसानों को स्प्रिंकलर और मल्चिंग तकनीक की सलाह दी जा रही है। पिछले वर्षों में भी बागेश्वर सहित अल्मोड़ा, नैनीताल जैसे जिलों में गर्मी और सूखे से गेहूं उत्पादन में कमी देखी गई थी।
जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में वर्षा का पैटर्न प्रभावित हुआ है। पहले अक्टूबर-दिसंबर में 2-3 बार हल्की बर्फबारी होती थी, जो मिट्टी को नमी प्रदान करती थी। अब अनियमित मौसम, बढ़ते तापमान (दिसंबर में 8-26 डिग्री सेल्सियस) और सूखे की घटनाएं आम हो गई हैं। इसका प्रभाव उत्पादन में भी दिखेगा।
विपिन जोशी, हिंदुस्तान समाचार गरुड़





