विपिन जोशी ….
प्लास्टिक प्रकृति के लिए धीमा ज़हर साबित हो रहा है . वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक से होने वाले ख़तरों पर नई चेतावनी साझा की है . दुनिया में बहुत सारी बीमारियों के पीछे प्लास्टिक है . द लैसेंट ने प्लास्टिक उत्पादन और प्लास्टिक प्रदूषण पर जारी रिपोर्ट में बताया है कि 1950 के बाद दुनिया में प्लास्टिक का उत्पादन 200 गुना से ज़्यादा बढ़ गया है. आगामी तीन दशक में यह उत्पादन एक अरब टन प्रतिवर्ष से अधिक हो जाएगा.
वर्तमान में चीन प्लास्टिक उत्पादन में सबसे बड़ा उत्पादक है . चीन 475 मिलियन टन प्लास्टिक उत्पादन प्रति वर्ष करता है जबकि 1950 तक दो मिलियन टन उत्पादन था .
यह चिंता का विषय है कि प्लास्टिक की मौजूदगी आज माउंट एवरेस्ट पर्वत से समुद्र तल तक मौजूद है. हमारे धार्मिक स्थल हों या पर्यटन स्थल हर जगह प्लास्टिक किसी राक्षस की तरह मौजूद है .
द लैसेंट की रिपोर्ट बताती है कि भारत में क़रीब 57 फ़ीसदी प्लास्टिक कचरे को खुले में जलाया जाता है, क़रीब 43 फ़ीसदी कचरा लैंडफिल में जाता है . देश की राजधानी दिल्ली की हवा सबसे ज़्यादा प्रदूषित है . स्थानीय स्तर पर जहाँ भी छोटे कस्बे या बाज़ार विकसित हुए हैं वहाँ कि नदियाँ प्लास्टिक कचरे का शिकार हुई हैं. प्लास्टिक रैपर्स और प्लास्टिक के कई सारे सामान आज प्रकृति के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं . प्लास्टिक कचरे का उपयोग सड़क निर्माण के लिए करने से काफ़ी हद तक प्लास्टिक कचरे का निस्तारण हो सकता है लेकिन यह तकनीक बहुत सीमित देशों में लागू है. भारत जैसे विकासशील देश के लिए प्लास्टिक कचरे से निपटना भविष्य के लिए एडवांस में एक भारी समस्या बनने जा रही है . साफ़ पेयजल के बाद प्लास्टिक कचरे की समस्या भयावह हो सकती है .





