-मंजु पांगती
लक्ष्मी आश्रम और कौसानी से जुड़ी यादें।
प्राकृतिक सौंदर्य और हिमश्रंखला के दर्शनार्थ देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा कौसानी एक शांत और सुरम्य वादी में बसा उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद का एक गांव है। इसके अतिरिक्त महात्मा गांधी जी ने अपना अनासक्ति आश्रम यहां पर स्थापित किया है। अनासक्ति योग की प्रस्तावना गांधी जी ने यहीं पर लिखी थी, गांधी जी 1929 में मात्र दो दिन के प्रवास के लिए यहां आए थे लेकिन यहां का शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य के वशीभूत होकर वे यहां पूरे चौदह दिन रुक गए थे। मैं पिछले तीन दशकों से ग्वालदम में अध्यापन कार्य करते हुए निवास कर रही हूं। अनेकों बार अनासक्ति आश्रम,लक्ष्मी आश्रम संग्रहालय एवं पंत वीथिका का भ्रमण कर चुकी हूं, लेकिन लक्ष्मी आश्रम आज पहली बार 08/07/2025 को सरला बहन की पुण्य तिथि के अवसर पर आना संभव हो पाया। राधा दी ने सरला बहन के साथ मिल कर गांव की महिलाओं की शिक्षा,स्वास्थ एवं आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए अथक प्रयास किए थे।
सरला बहन जो एक विदेशी महिला थी उनका नाम कैथरीन मैरी हैलमैन था, गांधी जी की विचार धारा से प्रभावित होकर उन्होंने गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई । वर्ष 1946 में उन्होंने कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की । सरला बहन के महान कार्यों पर प्रकाश डालते हुए डा रमेश चन्द्र पंत जी ने कहा क्रांतिकारियों के परिवारों व बच्चों के लिए वे दवाएं एवं रसद की व्यवस्था देखा करती , अंग्रेजों ने उन्हें आश्रम में नज़र बंद किया था, इस लिए वे रात में घने जंगलों से होकर अनेक गांव में जाती और सुबह तक आश्रम में पहुंच जाया करती। महिलाओं के उत्थान और पर्यावरण के प्रति उनके किये गये योगदान अविस्मरणीय हैं, श्रीमद भगवत गीता का उन्होंने विषद अध्ययन किया था साथ ही अनेक किताबें भी लिखीं थीं उनका मानना था कि विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन से ही मानवता का कल्याण हो सकता है “। डा रमेश चन्द्र पंत जी ने सरला बहन पर ही अपनी पी एच डी की थीसिस लिखी थी ।
लक्ष्मी आश्रम आज भी सरला बहन के विचारों को आगे बढ़ाते हुए बालिका शिक्षा, बौद्धिक विकास, स्वावलंबन पर आधारित शिक्षा लड़कियों को दे रहा है। वर्तमान में पचास लड़कियां आश्रम में पढ़ाई कर रही हैं। मैं,विपिन जोशी (पत्रकार) और गोपाल के साथ सबसे पहले सरला बहन की समाधि स्थल पर पहुंची और उन्हें पुष्प अर्पित कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। घने बांज के जंगल के बीचो बीच बनी समाधि में वे चिरनिंद्रा मग्न हैं, वहां की शांति में हमने कुछ पल व्यतीत किए। उसके बाद हम लक्ष्मी आश्रम की संरक्षिका नब्बे वर्षीया, पद्मश्री और जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित राधा दीदी से मिलने उनके निवास पर गये, बाहर कान्ति दीदी मिली, मैं पहली बार उन से मिले रही थी, गोपाल ने मेरा परिचय कांति दीदी से करवाया, और मैंने अपनी इच्छा जाहिर की कि मैं राधा दीदी से मिलना चाहती हूं। कांति दीदी ने बताया कि अभी राधा दीदी आराम कर रहीं हैं पिछली रात वे ठीक से सो नहीं पाईं थी,सुबह समाधि स्थल के कार्यक्रम में काफी देर तक शामिल रहीं इस लिए अब वो कब उठेंगी नहीं पता।
राधा दीदी से मुलाकात हो पाती तो मेरे लिए एतिहासिक महत्व का पल होता, कांति दीदी से मिलना भी ऐतिहासिक क्षण था। दो बजे से आश्रम के स्कूल के बच्चों का कार्यक्रम होना था,अभी ग्यारह बज रहे थे,इस लिए हम रमेश मुमुक्षु जी से मिलने चले गए वो सरला बहन के जीवन संघर्ष और कृतित्व पर पुस्तक लिखने की योजना के तहत सामग्री एकत्रित करने के लिए आश्रम में उपस्थित थे, विपिन और गोपाल ने उनसे बातचीत की फिर हम तीनों आश्रम की ओर चल दिए।
आश्रम में पहुंचे तो बच्चों ने जय जगत कह कर हमारा अभिवादन किया। इस आश्रम में जय -जगत कह कर अभिवादन किया जाता है। मैं समझी नहीं तो मैंने गोपाल से पूछा कि ये क्या कह रही हैं! तो उन्होंने बताया कि जय-जगत बिनोवा का नारा था,वे सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की बात किया करते थे। सरला बहन और विनोबा दोनों ने गांधी जी के सत्य, अहिंसा, ग्रामोत्थान एवं आत्मनिर्भरता को आधार बना कर सादा जीवन एवं समाजसेवा को अपना लक्ष्य बनाया था। यह सुनकर मुझे अच्छा लगा और एहसास हुआ कि कितनी सारी बातें आज मालूम होने वाली है यह तो अभी शुरुआत है। इसके बाद हम तीनों आश्रम का परिसर घूमने निकले विपिन और गोपाल मुझे अनेक जानकारी दे रहे थे। मैं दिल से विपिन का शुक्रिया अदा कर रही थी, उन्होंने ही मुझे यहां आने का निमंत्रण दिया था। जैसे ही हम कौसानी पहुंचे तो वहां गोपाल हमें मिले जो विपिन के मित्र हैं।
चारों ओर बांज के जंगल और अनेक खेत थे जिसमें हल्दी की खेती अधिक की गई थी कुछ खेतों में सब्जियां उगाई गई थी। ऊनी कारोबार के लिए चर्खे,रांच आदि का एक कमरा था जिसमें पहले ऊनी ग्रामोद्योग चलता था लेकिन अब नहीं चलता। गाय पालन अभी भी हो रहा है। एक कमरे में कारपेंटर अपना काम कर रहे थे । कताई-बुनाई एवं क्राफ्ट का काम अभी भी होता है लेकिन पहले की तरह नहीं होता। घूम फिर कर हम वापस आ गये अभी बारह बज रहे थे, विपिन बोले चलो अब सभागार में बैठ जाते हैं,आंगन के अहाते पर एक पानी का घड़ा रखा गया था उन दोनों ने पानी पिया और हम अंदर बैठ गए, ऊपरी मंजिल में सभागार है और भूतल में रसोई घर। सभागार में कुछ बच्चे बैठे थे मैं बच्चों के पास बैठ गई और बातें करने लगी उनमें कक्षा छ: की छात्राऐं अधिक थी। वे बच्चियां बातें करते हुए एकदम मुझ से घुल-मिल गई और मुझ से आग्रह करने लगीं कि दो चार दिन यहीं रहो न! मैंने पूछा क्या ऐसे किसी को भी यहां रहने की अनुमति मिल जातीं है क्या? तो वे बच्चियां बोली हां हां यहां बहुत कमरे हैं अभिभावक लोग आते हैं तो कुछ दिन रहते हैं। मैंने कहा – आज तो मैं नहीं रह पाऊंगी क्यों कि छुट्टी नहीं है मेरे पास! तो वे बोलीं कि आप जन्माष्टमी के दिन आना यहां बाजार में मेला लगता है। मैंने उनसे वादा किया कि जरूर आऊंगी, और सोचने लगी कि मुझे आज तक मालूम नहीं था कि कौसानी में कृष्ण जन्माष्टमी पर मेला भी लगता है, 40-45 किमी दूर ही तो है कौसानी ग्वालदम से। कुछ साल पहले ही मुझे पता चला कि बग्वालीपोखर में भैयादूज पर मेला लगता है। हम कितने अनभिज्ञ हैं अपने आसपास की लोक संस्कृतियों से ।
कुछ देर बाद नीमा दीदी कमरे में आई विपिन और गोपाल तो पूर्व परिचित थे इस लिए मेरा परिचय कराया गया वे तीनों आपस में बातें कर रहे थे आश्रम की भावी योजनाओं पर विचार -विमर्श करने के बाद भोजन की तैयारी हो गई। कुछ बच्चे स्कूल से आ रहे थे मैंने उनसे बात की तो पता चला कि कक्षा आठ तक बच्चे सरकारी जूनियर स्कूल में पढ़ने जाते हैं, नवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई आश्रम में ही होती है। इंटर पास करने को बाद एक साल का एक कोर्स होता है जिसमें महात्मा गांधी और सरलता बहन को पढ़ाया जाता है साथ ही कम्प्यूटर भी सिखाया जाता है यहां आने वाली ये लड़कियां पहाड़ के दूर-दराज के गांव की गरीब परिवार की होती हैं। लेकिन यहां आ कर उनके व्यक्तित्व का चहुंमुखी विकास होता है। यह मैंने देखा स्व अनुशासित ये बालिकाएं अपने दायित्वों को कुशलतापूर्वक निभा रही थी। भोजन निर्माण से लेकर आर्टिकल लिखने तक इनकी कार्यकुशलता परिलक्षित हो रही थी, हमनें भी सामूहिक भोजन किया,ठीक दो बजे से कार्यक्रम शुरू हुआ जिसका संचालन इन्हीं बच्चों द्वारा किया जा रहा था, स्वरचित गीत पर नृत्य, प्रार्थना के उपरांत यहां की दो हस्त लिखित पत्रिकाओं का प्रकाशन किया गया जो त्रैमासिक पत्रिकाएं हैं। जिनका नाम सूर्योदय एवं विजय है। ये पत्रिकाएं सरला बहन द्वारा प्रारंभ की गई थी और आज तक निर्बाध रुप से प्रकाशित हो रही हैं। इनकी विशेषता है कि ये हस्त लिखित हैं, बच्चे स्वयं इसे सम्पादित करतीं । इनके आवरण पृष्ठ ता पीछे के पृष्ठ बेहद आकर्षक थे इनके सम्पादकीय लेख और उसका प्रस्तुतीकरण बेहतरीन था। विजय वैचारिक पत्रिका है जो नवीं कक्षा से ऊपर के बच्चों के लिए है, सूर्योदय जूनियर कक्षाओं के लिए।
अगला कार्यक्रम था सरलता बहन के जीवन पर प्रकाश डालते हुए वक्तव्य देने का, सभी लड़कियों ने बहुत ही प्रभावशाली तरीके से अपने -अपने वक्तव्य दिए उनमें वाकपटुता दिखाई देती है। मैं महसूस कर रही थी कि यही तो चाहती थी सरला बहन, महिलाएं शारीरिक, मानसिक, वैचारिक एवं आर्थिक रूप से सक्षम बनें लक्ष्मी आश्रम सरला बहन के सपनों को साकार करने में सफ़लता प्राप्त कर रहा है।
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