विपिन जोशी.
उत्तराखंड की राजनीति में इस समय ‘दलबदल‘ और ‘घर वापसी‘ की चर्चाएं काफी गर्म हैं। हालांकि, अभी तक कांग्रेस या बीजेपी कीओर से आधिकारिक तौर पर उन आठ नामों की सूची सार्वजनिक नहीं की गई है, जो दिल्ली में हाई कमान के सामने शामिल होनेवाले हैं, लेकिन सियासी गलियारों और हालिया घटनाक्रमों (मार्च 2026) के आधार पर एक बड़ी तस्वीर उभर रही है।
क्या असर हो सकता है इस पर एक विश्लेषण
* बहुमत पर असर: वर्तमान में बीजेपी के पास मजबूत बहुमत है, इसलिए सरकार गिरने का खतरा तो नहीं है, लेकिन नैतिक हार औरपार्टी के भीतर असंतोष का संदेश जनता के बीच जाएगा।
* कांग्रेस का पुनरुद्धार: लगातार चुनावी हार झेल रही कांग्रेस के लिए यह ‘संजीवनी‘ जैसा होगा। विशेष रूप से गणेश गोदियालऔर करन माहरा जैसे नेताओं के लिए अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका होगा।
* गुटबाजी का नया दौर: कांग्रेस में इन नए (या पुराने) नेताओं के आने से ‘भीतरी बनाम बाहरी‘ की जंग फिर छिड़ सकती है।
3. बीजेपी की रणनीति: ‘डैमेज कंट्रोल‘
बीजेपी इस संभावित सेंधमारी से अनजान नहीं है। हाल ही में ५ नए मंत्रियों को शपथ दिलाकर सीएम धामी ने क्षेत्रीय और जातीयसंतुलन साधने की कोशिश की है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट लगातार असंतुष्टों से संपर्क में हैं ताकि ‘दिल्ली कूच‘ को रोका जासके।
उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने हाल ही में दावा किया है कि “बीजेपी के कई विधायक हमारे संपर्क में हैं और सही समय आने पर धमाका होगा।” वहीं बीजेपी इसे कांग्रेस का “भ्रामक प्रचार” बता रही है।: फिलहाल उन आठ नामों को ‘गोपनीय‘ रखा गया है ताकि दलबदल कानून और तकनीकी पेचीदगियों से बचा जा सके।लेकिन दिल्ली के गलियारों में उत्तराखंड के नेताओं की बढ़ती आवाजाही बड़े सियासी तूफान की ओर इशारा कर रही है।
* गुटबाजी का नया दौर: कांग्रेस में इन नए (या पुराने) नेताओं के आने से ‘भीतरी बनाम बाहरी‘ की जंग फिर छिड़ सकती है।
3. बीजेपी की रणनीति: ‘डैमेज कंट्रोल‘
बीजेपी इस संभावित सेंधमारी से अनजान नहीं है। हाल ही में ५ नए मंत्रियों को शपथ दिलाकर सीएम धामी ने क्षेत्रीय और जातीयसंतुलन साधने की कोशिश की है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट लगातार असंतुष्टों से संपर्क में हैं ताकि ‘दिल्ली कूच‘ को रोका जासके।
ग्राउंड रिपोर्ट नोट: उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने हाल ही में दावा किया है कि “बीजेपी के कई विधायक हमारेसंपर्क में हैं और सही समय आने पर धमाका होगा।” वहीं बीजेपी इसे कांग्रेस का “भ्रामक प्रचार” बता रही है।
फिलहाल उन आठ नामों को ‘गोपनीय‘ रखा गया है ताकि दलबदल कानून और तकनीकी पेचीदगियों से बचा जा सके। लेकिनदिल्ली के गलियारों में उत्तराखंड के नेताओं की बढ़ती आवाजाही बड़े सियासी तूफान की ओर इशारा कर रही है।
उत्तराखंड में बीजेपी के उन ‘आठ विधायकों’ की चर्चा ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। हालांकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दल रणनीतिक कारणों से अभी नामों का आधिकारिक खुलासा नहीं कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में असंतोष के केंद्र बन चुके कुछ विशेष निर्वाचन क्षेत्रों और चेहरों पर सबकी नज़रें टिकी हैं।
संभावित क्षेत्रों और समीकरणों का विश्लेषण जहाँ ‘बगावत’ की चिंगारी सबसे तेज है:
1. देहरादून और आसपास का मैदानी इलाका (असंतोष का मुख्य केंद्र)
सबसे ज्यादा चर्चा उमेश शर्मा ‘काऊ’ (रायपुर सीट) को लेकर है। हाल ही में (फरवरी-मार्च 2026) उनके समर्थकों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच हुए विवाद के बाद वे अपनी ही सरकार के खिलाफ मुखर दिखे हैं।
• समीकरण: वे मूलतः कांग्रेसी पृष्ठभूमि के हैं। अगर वे घर वापसी करते हैं, तो उनके साथ आसपास की एक-दो सीटों के समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं।
2. तराई और उधम सिंह नगर की सीटें
कैबिनेट विस्तार में उधम सिंह नगर और हरिद्वार जैसे मैदानी जिलों की ‘उपेक्षा’ के आरोप लग रहे हैं।
• संभावित क्षेत्र: सितारगंज और गदरपुर के कुछ नेता जो पूर्व में कांग्रेस में थे, अब बीजेपी के भीतर ‘घुटन’ महसूस करने की बात कह रहे हैं। 2027 के चुनाव में टिकट कटने के डर से ये नेता दिल्ली के संपर्क में बताए जा रहे हैं।
3. कुमाऊं मंडल: पुराने दिग्गजों की नाराजगी
हाल ही में बीजेपी ने अपनी कोर कमेटी से विजय बहुगुणा और तीरथ सिंह रावत जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों को बाहर किया है।
• असर: विजय बहुगुणा का प्रभाव सितारगंज और उनके बेटे सौरभ बहुगुणा के माध्यम से है। भले ही वे खुद कांग्रेस में न जाएं, लेकिन उनके समर्थक गुट के नेता कांग्रेस के संपर्क में हो सकते हैं।
• पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा: बिशन सिंह चुफाल (दीदीहाट) जैसे वरिष्ठ नेता कई बार सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। पुराने बीजेपी कार्यकर्ताओं का एक गुट ‘आयातित नेताओं’ (जो कांग्रेस से बीजेपी में आए) को मिल रही तवज्जो से नाराज है।
4. हरिद्वार: ‘हरिद्वार ग्रामीण’ और ‘लक्सर’ का त्रिकोण
हरिद्वार की राजनीति में बीजेपी के भीतर दो-तीन फाड़ साफ नजर आ रहे हैं। यहाँ के कुछ पूर्व विधायक और वर्तमान कद्दावर नेता कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा के संपर्क में होने का दावा किया जा रहा है।
सियासी समीकरण बदलने के 3 बड़े कारण:
1.टिकट कटने का डर: बीजेपी 2027 में ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ कम करने के लिए कम से कम 30% विधायकों के टिकट काट सकती है। यह डर इन आठ नेताओं को कांग्रेस की ओर धकेल रहा है।
2.कैबिनेट विस्तार की आग: हालिया विस्तार (मार्च 2026) में जिन वरिष्ठ विधायकों को जगह नहीं मिली, वे अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
3.कांग्रेस की ‘घर वापसी’ नीति: गणेश गोदियाल ने साफ कर दिया है कि जो लोग 2016 में पार्टी छोड़कर गए थे, उनके लिए दरवाजे खुले हैं, बशर्ते वे बिना शर्त आएं।
अभी यह ‘माइंड गेम’ चल रहा है। बीजेपी इन नेताओं को मनाने के लिए बोर्ड और निगमों में अध्यक्ष पद का लालच दे रही है, जबकि कांग्रेस इन्हें 2027 के लिए ‘पक्का टिकट’ का आश्वासन। दिल्ली में होने वाली जॉइनिंग उत्तराखंड में 2016 के ‘बगावत काल’ की याद दिला सकती है, बस इस बार पासा उल्टा पड़ा है।





