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आस्था या चमत्कार? दियारी मेला

विपिन जोशी.


देवभूमि उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में स्थित गरुड़ तहसील का कोट भ्रामरी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हज़ारोंमांओं के अटूट विश्वास का केंद्र है। चैत्र मास की अष्टमी (चैती अष्टमी) की सर्द रात में जब पूरी दुनिया सो रही होती है, तब इस मंदिरके प्रांगण में जलते दीयों की रोशनी एक अलग ही भावुक कहानी सुनाती है । यह कहानी है उन महिलाओं की, जिनकी गोद सूनी है, लेकिन जिनके मन मेंमांबनने की लौ आज भी प्रज्वलित है।

चैत्र नवरात्रि की अष्टमी को कोट मंदिर भ्रामरी मंदिर में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखकर किसी का भी हृदय भर आए।खड़े दीयेकी इस पूजा में निःसंतान महिलाएं सूर्यास्त से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक, पूरे 12 घंटे हाथ में जलता दिया लेकर नंगे पैरखड़ी रहती हैं।

हाथ में जलता हुआ दीया लेकर, बिना हिलेडुले रात भर खड़े रहना शारीरिक और मानसिक धैर्य की पराकाष्ठा है।

कड़कड़ाती ठंड और मंदिर के अंदर दीयों की लौ से बनने वाला कार्बन और थकान के बीच ये महिलाएं मां भ्रामरी के ध्यान में लीन रहतीहैं।

अनामिका जोशी,गरुड़ जो महिला इस कठिन व्रत को पूर्ण करती है, मां भ्रामरी उसकी खाली झोली को खुशियों से भर देती हैं।महिलाओं के होंठ भले ही शांत हों, लेकिन उनकी आँखें संतान प्राप्ति की मन्नत मांगते हुए नम होती हैं।

उमा खाती, भकुनखोला – कोट भ्रामरी मंदिर का इतिहास कत्यूरी राजवंश से जुड़ा है। इसेकोट की माईभी कहा जाता है। अष्टमीकी  रात को पूरा मंदिर परिसरजय मां भ्रामरीके जयकारों और मंत्रोच्चार से गूंज उठता है।

इस अनुष्ठान में केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि उनके पति और परिवार भी पूरी रात उनके साथ खड़े रहकर उनका मनोबल बढ़ाते हैं।

व्रत लेने वाली महिलाओं को देखकर एहसास हुआ कि यह दृश्य सामाजिक एकजुटता और एक परिवार के साझा सपनों का जीवंतउदाहरण पेश करता है। जब वैज्ञानिक तर्क थक जाते हैं, तब वहां से विश्वास की यात्रा शुरू होती है। कोट मंदिर की ये लौ केवल तेलऔर बाती से नहीं, बल्कि एक स्त्री की अदम्य जिजीविषा से जलती है।

आस्था या चमत्कार? इस सवाल को मन के किसी कोने में रख कर आइए और साक्षात शक्ति को अनुभव कीजिए।

आधुनिक युग में भले ही इसे लोग एक कठिन परंपरा कहें, लेकिन उन सैकड़ों महिलाओं के लिए यह एक चमत्कारहै जिन्होंने यहाँ तपस्या के बाद अपनी संतान का मुख देखा। हर साल मंदिर में उन मांओं का वापस आना, जो अपनी संतानको गोद में लेकर मां का आभार व्यक्त करने आती हैं, इस परंपरा की प्रासंगिकता को और गहरा कर देता है। 

मेला डूंगरी के व्यवसायि जगदीश तिवारी कहते हैं कि शादी के 17 साल बाद दीया लिया और उनको संतान सुख मिला यह चमत्कार और आस्था का जीवंत उदाहरण है.

भोर की पहली किरण जब कत्यूर घाटी को छूती है, तब इन महिलाओं के चेहरों पर थकान नहीं, बल्कि एक अलौकिक संतोष होता हैइस उम्मीद का कि अब उनके आंगन में भी किलकारियां गूंजेंगी।

विपिन जोशी, गरुड़

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