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पर्यावरण सरंक्षण का नन्हा सिपाही गोलू

पर्यावरण सरंक्षण का नन्हा सिपाही: 7 साल के गोलू ने रोप दिए 600 पौधे


विपिन जोशी


उत्तराखंड की हसीन वादियों में जहाँ प्रकृति का सौंदर्य बिखरा है, वहीं बागेश्वर जिले के गरुड़ विकासखंड से पर्यावरण प्रेम की एक अद्भुत और प्रेरणादायक मिसाल सामने आई है। यहाँ राजकीय प्राथमिक विद्यालय मजकोट में दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले महज सात वर्षीय बालक गोलू ने इतनी छोटी सी उम्र में वह कर दिखाया है, जिसे करने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। गोलू ने अब तक 600 से अधिक पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण की एक नई इबारत लिख दी है।
जीआईसी मजकोट में कार्यरत प्रवक्ता मदन पूरी और मंजू पूरी के घर जन्मे इस नन्हे पर्यावरण प्रेमी के कदम छोटी उम्र में ही बड़े मकसदों की ओर बढ़ चुके हैं। जहाँ इस उम्र के बच्चे खेल-खिलौनों और टीवी-मोबाइल में अपना समय बिताते हैं, वहीं गोलू का अधिकांश समय मिट्टी, पौधों और हरियाली के बीच गुजरता है।
घर के संस्कारों से मिली प्रेरणा

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गोलू के इस अनोखे जूनून के पीछे उनके परिवार का मार्गदर्शन और संस्कार हैं। माता-पिता के शैक्षणिक और जागरूक परिवेश ने नन्हे गोलू के मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम का बीज बोया। मदन पूरी और मंजू पूरी ने गोलू की इस रुचि को पहचाना और उसे हर कदम पर प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे गोलू की यह आदत एक जुनूनी अभियान में बदल गई।
विद्यालय से लेकर गाँव तक हरियाली का संदेश
राजकीय प्राथमिक विद्यालय मजकोट में दूसरी कक्षा के छात्र गोलू का यह प्रयास सिर्फ पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, वह उनकी देखभाल भी एक गार्जियन की तरह करता है। अपने हाथों से लगाए गए 600 पौधों को सींचना और उनकी सुरक्षा करना उसकी रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। स्कूल परिसर हो या गाँव के आसपास की खाली जमीन, गोलू हर जगह हरियाली बिखेरने के मिशन में जुटा हुआ है।
गोलू के द्वारा किया गया पौधा रोपण – पत्थर चट्टा गुड़हल, , बांज, बुराश, देवदार, ऐलोवीरा, रबर प्लानट, अमलतास, कीवी, संतरा, कागजी नींबू, आडू, अमरूद, ऑक्ररीका, मोरपंखी, तेजपत्ता.
आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे समय में मजकोट के इस सात साल के बालक की यह पहल हर किसी के लिए एक सबक है। गोलू ने यह साबित कर दिया है कि पर्यावरण को बचाने के लिए उम्र नहीं, बल्कि दृढ इच्छाशक्ति और सच्चे समर्पण की आवश्यकता होती है।
गरुड़ विकासखंड का यह छोटा सा गोलू आज न सिर्फ अपने विद्यालय और क्षेत्र का मान बढ़ा रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और सुरक्षित भविष्य की नींव भी रख रहा है। गोलू की यह अनूठी कहानी हम सभी को प्रकृति से जुड़ने और कम से कम एक पौधा लगाने की प्रेरणा देती है।
विपिन जोशी, ग्राउंड रिपोर्ट, मजकोट, गरुड़

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