विपिन जोशी..
भारत की राजनीति में छात्र और युवा आंदोलन जब भी सड़कों पर उतरते हैं, तो उनका प्रभाव दूरगामी होता है। हाल ही में नीट लीक विवाद और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी में हुई गड़बड़ियों के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे (जुलाई 2026) के बाद, अब अगला बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक गतिरोध चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर गहराता जा रहा है।
देशभर के युवाओं और विपक्षी दलों द्वारा चलाए जा रहे इस आंदोलन का मुख्य केंद्र वोट सूची में हेरफेर और ‘वोट चोरी’ का मुद्दा है। वोट चोरी के आरोपों का मूल संबंध फर्जी मतदाताओं को शामिल करने और वास्तविक युवा मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने की शिकायतों से है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि 18 से 22 वर्ष की आयु वर्ग के पहली बार वोट देने वाले लाखों युवाओं के नाम सुनियोजित तरीके से मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए या काट दिए गए हैं। आरोप है कि किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर फ़ॉर्म 6 (नया नाम जोड़ने) और फ़ॉर्म 7 (नाम हटाने/आपत्ति जताने) का थोक में गलत इस्तेमाल किया गया। कई विधानसभा क्षेत्रों में एक ही पते या अमान्य पतों पर हजारों फर्जी मतदाताओं के नाम दर्ज पाए जाने का दावा किया गया है।
विपक्ष का कहना है कि SIR के दौरान बिना किसी ठोस भौतिक सत्यापन के वास्तविक मतदाताओं के नाम काट दिए गए। आरोप है कि SIR अभियान की प्रक्रिया और समय-सीमा की पर्याप्त जानकारी आम जनता और नए युवा मतदाताओं तक नहीं पहुंचाई गई, जिससे लाखों युवा पंजीकरण से वंचित रह गए।
जब विवाद बढ़ा, तो आयोग ने आनन-फानन में विशेष ‘यूथ रजिस्ट्रेशन कैंप’ का आयोजन किया। विपक्ष का आरोप है कि यह केवल अपनी गलतियों को ढकने और औपचारिक साख बचाने का दिखावा है।
पक्ष रुख और प्रमुख तर्क
विपक्ष (INDIA गठबंधन व युवा संगठन) • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तुरंत इस्तीफे की मांग। जन-प्रदर्शनों के ज़रिए यह संदेश देना कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक निष्पक्षता खो चुका है। संसद से लेकर जंतर-मंतर और राज्यों की राजधानी तक सड़कों पर उतरकर विरोध।
सत्तारूढ़ भाजपा • चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन कर रही है। SIR की प्रक्रिया पर सर्वसम्मति से निर्णय लिए गए हैं। विपक्ष अपनी लगातार राजनीतिक हार का ठीकरा संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ने की कोशिश कर रहा है।
2026 के मध्य में जब शिक्षा व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा Gen Z आंदोलन हुआ था, तब दबाव के चलते धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा था
ज्ञानेश कुमार के संदर्भ में स्थिति यह है: संवैधानिक पद का अंतर: केंद्रीय मंत्री को प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हटाया या बदला जा सकता है, जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी जटिल संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
राजनीतिक दबाव का असर: यद्यपि संवैधानिक तौर पर CEC को तुरंत हटाना आसान नहीं है, लेकिन यदि ‘Gen Z’ का यह आंदोलन पूरे देश के विश्वविद्यालयों, युवाओं और सड़कों पर फैल जाता है, तो सरकार के लिए नैतिक और राजनीतिक रूप से इस स्थिति को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
अब यह तो वक्त तय करेगा कि जन-आंदोलन का यह दबाव चुनाव आयोग में प्रशासनिक सुधार और नेतृत्व परिवर्तन की वजह बनता है या सरकार इसे राजनीतिक रूप से संभालने में सफल होती है।

















