विपिन जोशी..
पैराग्लाइडिंग के सफल टेक-ऑफ के बीच लाहुर घाटी में संचार व्यवस्था ‘क्रैश’
गरुड़ (बागेश्वर): गरुड़ तहसील के डनेराखाल में जब पैराग्लाइडर के पंख आसमान में लहराए, तो कत्यूर घाटी के ग्रामीणों की आंखोंमें उत्साह और भविष्य की उम्मीदें साफ झलक रही थीं। नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (NIM) जम्मू पहलगाम के तत्वाधान मेंआयोजित दो दिवसीय पैराग्लाइडिंग फेस्ट का भव्य उद्घाटन हुआ। लेकिन इस ऐतिहासिक उड़ान के शोर के बीच लाहुर घाटी केआठ गांवों की वह ‘खामोशी‘ भी सुनाई दी, जो पिछले कई वर्षों से एक अदद मोबाइल नेटवर्क के लिए तरस रही है।
साहसिक पर्यटन की नई उड़ान, बुनियादी ढांचा अभी भी जमीन पर
कत्यूर घाटी के दूरस्थ क्षेत्रों में जहां सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति पहले से ही नाजुक है, वहां पैराग्लाइडिंग की सफल लैंडिंगने पर्यटन की नई संभावनाएं तो जगाई हैं, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बेहद स्याह है। पैराग्लाइडिंग पायलटों ने खुमटिया गांव मेंलैंडिंग तो की, लेकिन टेक–ऑफ पॉइंट से लैंडिंग पॉइंट के बीच संपर्क साधने के लिए कोई मोबाइल सिग्नल मौजूद नहीं था।
सफेद हाथी साबित हो रहे मोबाइल टॉवर
लाहुर घाटी के गांवों में कहने को तो तीन मोबाइल टॉवर खड़े हैं, लेकिन ग्रामीणों के लिए ये केवल ‘शो–पीस‘ बनकर रह गए हैं।
* दूरी का संकट: जिला मुख्यालय बागेश्वर यहां से 22 किमी और गरुड़ 25 किमी दूर है।
* आपातकालीन चुनौती: नेटवर्क न होने के कारण आपात स्थिति में 108 एम्बुलेंस सेवा को कॉल करना किसी पहाड़ चढ़ने जैसीचुनौती से कम नहीं है।
राजू दानू, ग्राम प्रधान ने कहा विचित्र विरोधाभास है एक ओर प्रशासन जखेड़ा गांव में आपदा प्रबंधन की ‘मॉकड्रिल‘ की तैयारी कररहा है, वहीं ग्रामीणों का कहना है कि बिना संचार के ऐसी ड्रिल केवल खानापूर्ति है। बिना संचार के इतना बड़ा आयोजन हो गया।उड़ान के दौरान टेक–ऑफ और लैंडिंग पॉइंट के बीच कोई संपर्क नहीं था। आपदा के समय हम प्रशासन से कैसे जुड़ें? तहसीलदिवस और जनता दरबार में केवल आश्वासन मिलते हैं, समाधान राम जाने कब होगा।“
डिजिटल इंडिया बनाम जमीनी हकीकत
सैलानी गांव के निवासी नवीन जोशी, जो एक सीएससी (CSC) सेंटर चलाते हैं, बताते हैं कि गांव में तीन साल पहले 4G टॉवर लगाथा, लेकिन वह अक्सर बंद रहता है। उन्होंने कहा, “ज्यादातर ग्रामीणों के पास कीपैड फोन हैं और टॉवर सफेद हाथी हो चुके हैं। ऐसालगता है ये टॉवर केवल चुनावी मौसम के लिए हैं।“
वहीं, स्थानीय महिलाओं का दर्द भी समान है। उनका कहना है कि दुनिया ऑनलाइन हो रही है और एआई (AI) की बातें कर रही है, लेकिन उन्हें एक कॉल करने के लिए भी पहाड़ियों की चोटी पर दौड़ना पड़ता है।
क्या कहता है प्रशासन?
मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम (SDM) गरुड़ ने सकारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा: दूरस्थ गांवों में मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता अनिवार्य है। हम जल्द ही संचार विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे ताकिखुमटिया और लाहुर क्षेत्र में संचार व्यवस्था सुचारू हो सके। मैं स्वयं इस क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण (विजिट) करूंगा।“
पैराग्लाइडिंग फेस्ट ने यह साबित कर दिया कि इस घाटी में हुनर और कुदरत की कोई कमी नहीं है, लेकिन अगर सरकार ‘डिजिटलविकास‘ के अपने दावों को सच करना चाहती है, तो उसे लाहुर घाटी के इन आठ गांवों को नेटवर्क के जरिए दुनिया से जोड़ना हीहोगा। वरना, ये ऊंची उड़ानें केवल कागजों और तस्वीरों तक ही सीमित रह जाएगी.




