विपिन जोशी
मौसम विभाग के एलर्ट के अनुसार उतराखण्ड में दो दिवसीय वर्षा का अनुमान था, पूर्वानुमान हकीकत में बदला कत्यूर घाटी में धान की खड़ी फसल खेतो में पसर चुकी है। मानसून को विदाई के बाद असोज के महीने में बारिश अक्सर धान के लिए नुकसानदायक होती है। कत्यूर घाटी को धान का कटोरा भी कहते हैं, चार दशक पूर्व यहां 15 प्रकार का धान उगाया जाता था . इस बार बेमौसमी बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है.अब तक अनुमानित 70% धान की फसल बर्बाद हो चुकी है. बारिश जारी रही तो किसानों की लागत भी बमुश्किल वापिस आएगी.
लाल सिंह, मझार चौरा, गरुड़ – प्रगतिशील किसान लाल सिंह ने बताया कि वे विगत तीस वर्षों से अपनी दो सौ नाली भूमि में जैविक खेती कर रहे हैं। देशी धान के साथ वे श्रीधान, लाल धान, मणिपुरी काला धान की उगा रहे हैं, लाल सिंह कहते हैँ इस मौसम में अधिक बरसात धान के लिए नुकसान दायक साबित होगी.
तानिया बिष्ट, नौगांव – मानसून जाने के बाद ठीक असोज में इतनी ज्यादा बारिश धान की फसल को नुकसान पहुंचा रही है। कत्यूर घाटी धान की अच्छी पैदावार के लिए जानी जाती है। ज्यादा बारिश से धान काला पड़ जाएगें और कटे धान सड़ने लगते हैं।
चंद्र शेखर पांडे, चोरसों गरुड़ – ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से अब मौसम चक्र बदल चुका है। असोज में भारी बारिश होने लगी है। इसका असर खेती में दिखने लगा है। पाण्डे बताते हैं कि इस बार लाल धान और मणिपुरी धान की बम्पर पैदावार होने की उम्मीद पर बारिश ने पानी फेर दिया है।
दीपा बिष्ट, नौगांव – जंगली जानवरों से खेती बच भी गई तो अब बारिश ने कसर पूरी कर दी है। दो दिन तक लगातार बारिश रही तो धानकी फसल खराब हो जाएगी. साथ में कटी हुई घास गाज्यों भी खराब हो जाएगा। कुल मिलाकर किसान को भारी नुकसान हो सकता है.
कव्यूर घाटी में उगाए जाने वाली धान की प्रमुख किस्में निम्नवत थी –
लालमती (लाल धान): घाटी की सबसे प्रसिद्ध और औषधीय गुणों से भरपूर किस्म, जो स्वास्थ्य के लिए उत्तम मानी जाती थी।
बासमती (स्थानीय देशी बासमती): गरुड़ सिरा की देशी बासमती अपनी विशेष सुगंध और स्वाद के लिए जानी जाती थी।
तामचीनी (तामचूड़ी): दाने का रंग तांबे जैसा हल्का लाल-भूरा होता था। यह भात और चूड़ा (पौण) दोनों के लिए बहुत लोकप्रिय थी।
हंसराज: सफेद, लंबा और सुंगधित दाना.
दुधराज: भात पकाने पर अत्यंत मुलायम और स्वादिष्ट होने वाली सफेद रंग की किस्म।
कस्तूरी: तीखी और भीनी सुगंध के लिए प्रसिद्ध पारंपारिक प्रजाति।
अणा (अना) धान: यह मुख्य रूप से असिंचित (उपरों) खेतों में सूखा सहन करने वाली मजबूत प्रजाति थी।
झंगोरा / स्यूंड़ी धान: कम पानी और ऊंचाई वाले या पथरीले खेतों में आसानी से उगने वाली किस्में।
रत्नचूड़ी एवं रामजवा: विशेष पकवानों और मांड वाले भात के लिए प्रयोग होने वाले देशी बीज।
विपिन जोशी, गरुड़






















