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समृद्ध लोक-आस्था से जुड़ा है कदली वृक्ष पूजन मवई

 

विपिन जोशी, गरुड़

उत्तराखंड के , कोट भ्रामरी मंदिर में भाद्रपद माह की नंदाष्टमी पर नंदा-सुनंदा महोत्सव का विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। इस दौरान मवई (गरुड़) गाँव से कदली वृक्ष लाने और पूजन की परंपरा का इतिहास अत्यंत समृद्ध और लोक-आस्था से जुड़ा है।

कुमाऊं में नंदाष्टमी पर नंदा और सुनंदा की मूर्तियां मिट्टी या धातु के बजाय पवित्र कदली वृक्ष, केले के तने से बनाई जाती हैं। मवई गांव के परिहार लोग कदली वृक्ष पूजन के प्रमुख होते हैँ.

राजेंद्र प्रसाद तिवारी, पुजारी कोट मंदरी – विधि विधानपूर्वक दो सुयोग्य कदली वृक्षों का चयन कर उन्हें काटा जाता है और मंदिर तक लाया जाता है। नंदाष्टमी मेला चंद राजवंश और कत्यूरी काल से चला आ रहा है. मेला  कई शताब्दियों लगभग 500 से 800 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है.

बलवंत भंडारी, मेला समिति – कत्यूर घाटी ऐतिहासिक रूप से कत्यूरी राजवंश का मुख्य गढ़ रही है।  कत्यूरी शासकों के समय से ही मां भगवती (नंदा/भ्रामरी) की उपासना का यह विधान चला आ रहा है। बाद में चंद राजाओं ने इसे भव्य मेले और सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया.

किशन बोरा, देवनाई, अध्यक्ष मेला समिति – देवनाई के बोरा लोग देवी के आभूषणो की सुरक्षा करते हैँ,  नैनोल गाते है और देवी की सेवा में तत्पर रहते हैँ. नंदा देवी का मायका भी इस क्षेत्र को माना जाता है. जखेड़ा और मेलाडूंगरी गांव के परिहार और भंडारी लोग प्रत्येक वर्ष बारी बारी से मेले के आयोजन में सक्रीय रहते हैँ.

शिव सिंह परिहार,मवई  – भाद्रपद की सप्तमी को कदली वृक्ष के चयन व आमंत्रण (अक्षत-पिठ्या अर्पित कर) की पूजा होती है, और अष्टमी (नंदाष्टमी) के दिन वृक्ष को काटकर गाजे-बाजे और डंगरियों (अवतारियों) के साथ लाया जाता है। इन्हीं तनों से मां नंदा और सुनंदा के विग्रह तैयार किए जाते हैं। लोकमान्यता है कि नंदा (पार्वती) ध्याणी (बेटी) के रूप में मायके आती हैं। कदली वृक्ष का पूजन और उससे प्रतिमा का निर्माण धन-धान्य, वंश वृद्धि और क्षेत्र की खुशहाली व सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

ईश्वर परिहार, जखेड़ा –

कदली वृक्ष पूजन और उसे लाने की प्रक्रिया में समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता होती है.  गाँव के ग्रामीण व मुख्य पुजारी/धानक  मवई गाँव और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय ग्रामीण, डंगरिया (देव-आवाहन प्राप्त व्यक्ति) और पारंपरिक पुजारी इस अनुष्ठान को संपन्न कराते हैं।

इस बार जखेड़ा गांव के परिहार लोग मेले के मुख्य संचालक की भूमिका में हैँ. कदली वृक्ष लाते समय ढोल-दमाऊ, रणसिंगा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ ग्रामीण और महिलाएं माँ के मंगलगीत (नंदा के शकुनाखर) गाते हुए शोभायात्रा निकालते हैं।

 

 

 

 

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