रेशम उत्पादन: किसानों की आर्थिक समृद्धि और आत्मनिर्भरता का सशक्त आधार
विपिन जोशी, स्वर स्वतंत्र
बागेश्वर जिले में संचालित ‘मेरा रेशम, मेरा अभिमान ’ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में सेरीकल्चर (रेशम कीट पालन) एक क्रांतिकारी कदम साबित हो रहा है। केंद्रीय रेशम बोर्ड और राज्य रेशम विभाग के संयुक्त प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की नई लहर आई है। कृषि के पारंपरिक तरीकों से इतर, रेशम उत्पादन किसानों के लिए आजीविका का एक टिकाऊ और लाभदायक विकल्प बन चुका है।
कार्यक्रमों का आयोजन केंद्रीय रेशम बोर्ड एवं राज्य रेशम विभाग के सहयोग से किया गया। इस अवसर पर डॉ. विक्रम कुमार, वैज्ञानिक-सी, के.एस. चौहान, वरिष्ठ तकनीकी सहायक, बृजेश रतूड़ी, जिला नोडल अधिकारी तथा कमलेश कुमार, ब्लॉक नोडल अधिकारी की उपस्थिति रही। साथ ही संबंधित गांवों के ग्राम प्रधानों ने भी कार्यक्रम में उपस्थित होकर सक्रिय सहभागिता की।

रेशम उत्पादन से किसानों को मिलने वाले प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:
कम लागत में अधिक मुनाफा: रेशम कीट पालन (विशेषकर शहतूत और टसर रेशम) के लिए बहुत अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता नहीं होती। किसान अपनी कम उपजाऊ या बंजर भूमि पर भी शहतूत के पौधे लगाकर बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
कम समय में बार-बार आय: अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में रेशम कीट पालन का चक्र बहुत छोटा (लगभग 25 से 30 दिन) होता है। इससे किसानों को वर्ष में कई बार (नियमित अंतराल पर) आय प्राप्त होती है, जिससे उनकी नकदी (कैश फ्लो) की समस्या दूर होती है।
महिला सशक्तिकरण एवं घरेलू भागीदारी: रेशम उत्पादन का अधिकांश कार्य—जैसे पत्तियों की तुड़ाई, कीटों की देखरेख और कोकून की देखभाल—घर के आंगन या आसपास ही होता है। इसमें ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक रहती है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
पर्यावरण अनुकूल एवं टिकाऊ खेती: शहतूत के वृक्षारोपण से न केवल मृदा अपरदन रुकता है, बल्कि पर्यावरण संतुलन भी बना रहता है। यह एक पूर्णतः जैविक और पारिस्थितिकी के अनुकूल आजीविका साधन है।
बाजार की सुनिश्चित मांग और सरकारी प्रोत्साहन: रेशम कोकून की मांग कपड़ा उद्योग में हमेशा बनी रहती है। ‘मेरा रेशम, मेरा अभिमान ‘ जैसे कार्यक्रमों के जरिए किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, उन्नत बीज (डीएफएल) और कोकून बिक्री के लिए बाजार की सीधी सुविधा मिलती है।
बागेश्वर में वैज्ञानिक अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर तकनीकी मार्गदर्शन मिलने से किसान रेशम क्षेत्र से जुड़कर अपनी आय दोगुनी करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।



















