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पालपुर में रेशम खेती से जुड़ते किसान

स्वर स्वतंत्र

​पालपुर में रेशम किसानों को मिला वैज्ञानिक रोग प्रबंधन का गुर: MRMA 2.0 के तहत प्रशिक्षण आयोजित

​अल्मोड़ा/स्याल्देह (19 अगस्त 2026):

केंद्रीय रेशम बोर्ड (वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार) के राष्ट्रीय अभियान ‘मेरा रेशम मेरा अभिमान (MRMA 2.0)’ के अंतर्गत बुधवार को अल्मोड़ा जिले के स्याल्देह क्षेत्र स्थित ग्राम पालपुर में एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। “रेशमकीट एवं शहतूत रोग प्रबंधन पद्धतियां” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 30 रेशम उत्पादक किसानों ने भाग लिया और वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी प्राप्त की।

​यह कार्यक्रम क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र (RSRS), सहसपुर (देहरादून) तथा रेशम निदेशालय (DoS), उत्तराखंड के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था।

​आगामी शरदकालीन फसल की तैयारियों पर जोर

​स्याल्देह क्षेत्र में सितंबर माह से शरदकालीन (ऑटम) रेशमकीट पालन प्रस्तावित है। इसी के दृष्टिगत प्रशिक्षण सत्र में आगामी फसल की पूर्व तैयारियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया।

​मुख्य वक्ता और RSRS सहसपुर के प्रमुख वैज्ञानिक-डी डॉ. पवन सैनी ने किसानों को MRMA 2.0 अभियान के उद्देश्यों की जानकारी देते हुए बताया कि इस राष्ट्रीय पहल का मुख्य लक्ष्य उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों को सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाना है, जिससे कोकून की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाकर किसानों की आय में वृद्धि की जा सके।

​ग्रासरी रोग और मानसून प्रबंधन पर दी गई सलाह

 

​प्रशिक्षण के दौरान क्षेत्र के किसानों द्वारा सामना की जाने वाली मुख्य समस्याओं, विशेषकर ‘ग्रासरी (Grasserie)’ रोग पर गहन चर्चा हुई। किसानों ने बताया कि चौथी और पांचवीं अवस्था में यह रोग फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है।

​वैज्ञानिकों ने इसके समाधान हेतु निम्नलिखित महत्वपूर्ण सुझाव दिए:

​सूक्ष्म वातावरण (Microclimate) का प्रबंधन: कीट पालन गृह में उचित तापमान, आर्द्रता, स्वच्छता और पर्याप्त वायु-संचार बनाए रखें।

​विजेता व चूने का प्रयोग: चौथी व पांचवीं अवस्था में अनुशंसित मात्रा के अनुसार ‘विजेता’ (Vijetha) बेड डिसइन्फेक्टेंट और बुझे हुए चूने (Slaked Lime) का वैकल्पिक उपयोग करें।

​मानसून की सावधानियां: कीटों को गीली या नमी युक्त शहतूत की पत्तियां न खिलाएं। अत्यधिक नमी से बचाव करें और मोल्ट (निद्रा अवस्था) के दौरान कीटों को व्यवधान न पहुंचाएं। मोल्ट पूरा होने के बाद ही सजगता से आहार दें।

​किसान-वैज्ञानिक संवाद

​कार्यक्रम में ‘वैज्ञानिक-कृषक संवाद एवं समाधान’ सत्र का भी आयोजन किया गया, जिसमें किसानों ने अपनी व्यावहारिक शंकाओं को रखा। डॉ. सैनी ने शहतूत बागान के रखरखाव, कीटों के समुचित विसंक्रमण (Disinfection), परिपक्व कीटों की पहचान, समय पर माउंटिंग (कोकून बनाने हेतु रखना) और कोकून की सही कटाई-भंडारण से जुड़े सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर दिए।

​विभागीय सहयोग और मार्गदर्शन

​रेशम निदेशालय, उत्तराखंड की ओर से स्याल्देह के निरीक्षक श्री मनीष रावत तथा सहयोगी कर्मचारी श्री ध्यान सिंह व श्री जगदीश कुमार ने कार्यक्रम में शिरकत की। अधिकारियों ने किसानों को विभागीय योजनाओं, अनुदानों और सुविधाओं की जानकारी देते हुए आगामी फसल में वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित किया।

​सितंबर की शरदकालीन फसल से ठीक पहले आयोजित इस प्रशिक्षण से क्षेत्रीय रेशम कृषकों में नया उत्साह देखा गया। किसानों का मानना है कि इन वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने से इस बार कोकून की फसल रोगमुक्त और अधिक लाभदायक सिद्ध होगी।

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