पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर तबादले का ग्रहण: डॉक्टर नदारद, इलाज को दर-दर भटक रहे मरीज
विपिन जोशी,स्वर स्वतंत्र
पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, कच्चे रास्ते और ऊपर से मानसून का खतरा—इन सबके बीच यदि किसी बीमार या गर्भवती महिला को अस्पताल का दरवाजा खटखटाना पड़े और वहाँ डॉक्टर नदारद मिले, तो इसे व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता ही कहा जाएगा। स्वास्थ्य विभाग में तबादला एक्ट के तहत हुए हालिया फेरबदल ने पहाड़ों के आम जनजीवन के लिए मुसीबतों का नया पहाड़ खड़ा कर दिया है। स्थिति यह है कि पहाड़ भेजे गए अधिकांश डॉक्टरों ने अभी तक नए स्थानों पर ज्वाइन ही नहीं किया है, जिससे कई अस्पतालों के पूरी तरह खाली होने की नौबत आ गई है।
सरकार ने जून माह के अंत में करीब 300 डॉक्टरों के थोकबंद तबादले किए थे। लेकिन इन कागजी आदेशों के आते ही डॉक्टरों ने नियमों का हवाला देकर पूरी सूची पर सवाल खड़े कर दिए। विरोध के सुर उठे तो स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के निर्देश पर संशोधन का दौर चला। करीब 200 डॉक्टरों ने प्रत्यावेदन देकर तैनाती बदलने की माँग की, जिनमें से 60 के करीब के आदेश संशोधित भी हो गए, जबकि 100 से अधिक डॉक्टर आज भी आदेश में बदलाव का इंतजार कर रहे हैं।
इस प्रशासनिक खींचतान और मनमानी का खामियाजा दूरदराज के पर्वतीय जिलों की जनता भुगत रही है। स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बागेश्वर जिले में भेजे गए किसी भी डॉक्टर ने अभी तक ज्वाइन नहीं किया है, जबकि रुद्रप्रयाग में सिर्फ एक और अल्मोड़ा में मात्र दो डॉक्टरों ने ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। विभाग के अधिकारी भी दबी में जुबान यह स्वीकार कर रहे हैं कि नई तैनाती पर भेजे गए अधिकांश चिकित्सक पहाड़ का रुख करने से बच रहे हैं।
अल्मोड़ा जिला अस्पताल की जमीनी हकीकत स्वास्थ्य दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। निदेशालय ने दूसरे जिलों से यहाँ 18 डॉक्टर भेजे थे, जिसके एवज में यहाँ से 19 डॉक्टरों को रिलीव कर दिया गया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि बाहर से आए 16 डॉक्टरों ने अब तक तैनाती ही नहीं ली।
‘जिला अस्पताल की हालत खराब है यहाँ जनरल फिजिशियन के कक्ष पर ताला लटका मिला। पीएमएस डॉ. एचसी गड़कोटी ने बताया कि फिजिशियन का स्थानांतरण हो चुका है और उनका रिलीव लेटर आ चुका है। मजबूरी में मरीजों को इलाज के लिए बेस अस्पताल की दौड़ लगाने पड़ रही है। रानीखेत उपजिला अस्पताल का हाल भी जुदा नहीं है; यहाँ रेडियोलॉजिस्ट के तबादले के बाद अब मजबूरन अस्पताल के सीएमएस को ही अल्ट्रासाउंड करना पड़ रहा है, जबकि नेत्र रोग सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और एलएमओ जैसे अहम पदों से भी डॉक्टर जा चुके हैं। चौखुटिया में भी रुद्रप्रयाग से भेजे गए ऑब्स एंड गायनी विशेषज्ञ समेत तीन अन्य डॉक्टर नदारद हैं, जिससे व्यवस्थाएँ पूरी तरह चरमरा गई हैं।
बागेश्वर: कागजों पर स्वास्थ्य सेवा, धरातल पर शून्य प्रशासनिक व्यवस्था –
बागेश्वर की स्थिति तो और भी अधिक दयनीय है। हालिया तबादलों के बाद जिले से आठ चिकित्सक रिलीव हो गए, जबकि उनके स्थान पर भेजे गए नौ नए डॉक्टरों में से एक ने भी अभी तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया है।
गुरुवार को जिला अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ थी और अस्पताल सिर्फ प्रभारी सीएमएस के भरोसे संचालित होता दिखा। दवाइयाँ तो पर्याप्त थीं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह शून्य नजर आई। सीएचसी कांडा का हाल यह है कि वहाँ नौ साल से डेंटल चिकित्सक तो तैनात हैं, लेकिन बैठने के लिए ‘डेंटल चेयर’ तक उपलब्ध नहीं है। वहीं सीएचसी बैजनाथ में अल्ट्रासाउंड सप्ताह में सिर्फ तीन दिन हो रहा है, भीड़ के चलते अल्ट्रासाउंड कराने पहुँची महिलाओं को यह कहकर घर लौटा दिया जा रहा है कि आज नंबर नहीं आयेगा “कल आना”।
एक बानगी देखिए बैजनाथ सीएचसी में कल कोहिना गाव से पहुंची दो महिलाओं ने अपनी आपबीती सुनाई-

अल्ट्रासाउंड सप्ताह में तीन दिन होने से मरीजों को खासा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है । 15 किमी दूर कोहिना गाव से अल्ट्रासाउंड कराने पहुंची अंकिता देवी और जया गोस्वामी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि यदि बैजनाथ में प्रतिदिन अल्ट्रासाउंड होता तो मरीजों की भीड़ कम होती और सभी की जांच हो पाती । हम सुबह 9 बजे से लाइन में लगे हैं 12: 30 बजे तक नंबर नहीं आया , ऑपरेटर ने कहा कल आना, अनिता देवी और जया ने ऑपरेटर आनंद बसवाल से गुहार लगाई कि दूर से आए हैं बरसात है उनका नंबर लगा दें इस पर डॉक्टर बसवाल भड़क गए और बोले नहीं होगी आज जांच जो करना है कर लो ।
दूरदराज के गाँवों से पहुँची अनिता देवी का पूरा दिन और 500 रुपये का किराया सिर्फ इस उम्मीद में बर्बाद हो गया कि उन्हें इलाज मिलेगा, लेकिन ऑपरेटर ने उन्हें कल आने का फरमान सुना दिया। वहीं जया गोस्वामी का दर्द इन हालात को पूरी तरह बयाँ करता है—”अस्पताल प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि पहले दूर-दराज से आए मरीजों की जाँच हो।गाँव के कच्चे रास्ते हैं, जिन पर बारिश के कारण सड़क बंद होने का भी खतरा रहता है।”
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
वहीं बागेश्वर के सीएमओ डॉ. कुमार आदित्य तिवारी ने बताया कि जिले से 16 चिकित्सकों का तबादला हुआ है जिनमें से आठ रिलीव हो चुके हैं, लेकिन नए नौ चिकित्सकों में से अभी तक कोई नहीं पहुँचा है। स्थानीय स्तर पर सीमित व्यवस्थाओं से ही काम चलाया जा रहा है।
सवाल यह है कि जब तक मैदान छोड़कर पहाड़ जाने वाले डॉक्टर कागजी बहाने और प्रशासनिक पत्रावलियों में उलझे रहेंगे, तब तक क्या बीमार पहाड़ यूँ ही इलाज के अभाव में दम तोड़ता रहेगा? स्वास्थ्य विभाग और शासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि तबादला नीति कागजी खानापूर्ति न बनकर दूरस्थ जनता के जीवन रक्षा की गारंटी बने।


















