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गांधी से सोनम वांगचुंग तक: सत्ता का अहंकार

भारतीय इतिहास के प्रमुख अनशन और जन-आंदोलन: एक ऐतिहासिक दृष्टि
विपिन जोशी
भारतीय इतिहास में सत्ता के अहंकार और दमन के विरुद्ध अनशन (हंगर स्ट्राइक) हमेशा से तानाशाही को झुकाने का एक अचूक और शक्तिशाली माध्यम रहे हैं। जब-जब सरकारें बहरी हुई हैं, राष्ट्र के प्रबुद्ध और समर्पित आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर व्यवस्था को झकझोरा है।

सोनम वांगचुंग का आमरण अनशन और सरकार का तानाशाही रवैया
सोनम वांगचुंग का आमरण अनशन और सरकार का तानाशाही रवैया

जब सत्ता अहंकारी हो जाती है तो जनांदोलन कुचले जाते हैं और पुलिसिया दमन शुरू होता है । विगत बीस दिनों से जंतर मंतर में प्रदर्शन और आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुंग को पुलिस द्वारा उठाना केंद्र सरकार की विफलता और तानाशाही को दर्शाता है ।
देश की गोदी मीडिया भी खामोश है और प्रदर्शन की लाइव स्ट्रीमिंग वैकल्पिक मीडिया के माध्यम से दुनिया तक पहुँच रही है ।
पेपर लीक मामले पर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर लाखों छात्र आंदोलनरत हैं लेकिन अभी तक प्रधानमंत्री की ओर से कोई बयान नहीं आया अब खबर है कि वो एक और विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं , पंजाब में रैली कर रहे हैं । लेकिन छात्र हितों पर मौन साधे हुए हैं । संवेदनशील एक्टर, स्वतंत्र पत्रकार, राजनैतिक कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता सभी का समर्थन छात्रों के साथ सोनम वांगचुंग के साथ है । सफदरजंग अस्पताल से सोनम वांगचुंग की पत्नी ने बयान दिया है कि बहुत जल्दी सरकार की तानाशाही नीति के ख़िलाफ़ यात्रा निकाली जाएगी ।
यह एक ऐतिहासिक यात्रा हो सकती है ।
गांधी युग से लेकर समकालीन भारत तक, अनशन के इतिहास और उनके परिणामों पर एक दृष्टि ।
1. महात्मा गांधी (विभिन्न ऐतिहासिक अनशन)
* प्रमुख अनशन: 1932 का कम्युनल अवॉर्ड के विरोध में पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन, और 1943 का 21 दिवसीय आमरण अनशन।
* परिणाम: ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा। 1932 में ‘पूना पैक्ट’ हुआ और दलितों के पृथक्करण की साजिश को गांधीजी के अनशन ने नाकाम किया। 1943 में अंग्रेजों को उनके स्वास्थ्य और जनआक्रोश के आगे विवश होना पड़ा।
2. स्वतंत्रता सेनानी जतीन्द्र नाथ दास (बाघा जतिन)
* अनशन की अवधि: 63 दिन (लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान)
* परिणाम: राजनीतिक कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार और भेदभाव के खिलाफ जेल में 63 दिनों तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल जारी रखने के बाद 13 सितंबर 1929 को उनका शहादत दिवस भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ बना। उनके बलिदान के बाद ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और जेल मैनुअल में सुधार करना पड़ा।
3. स्वामी श्रद्धानंद और अन्य स्वतंत्रता सेनानी
* परिणाम: औपनिवेशिक शासन के दौरान दमनकारी नीतियों और दमन के खिलाफ विभिन्न संतों और नेताओं द्वारा किए गए अनशनों ने जनमानस को जोड़ा, जिसके दबाव में ब्रिटिश हुकूमत को कई बार दमनकारी नीतियां वापस लेनी पड़ीं।
4. पोट्टी श्रीरामुलु (आंध्र प्रदेश राज्य का गठन)
* अनशन की अवधि: 58 दिन
* परिणाम: भाषा के आधार पर अलग राज्य (आंध्र प्रदेश) की मांग को लेकर 1952 में उन्होंने आमरण अनशन किया। उनके बलिदान और 58 दिन के लंबे अनशन के बाद केंद्र की तत्कालीन नेहरू सरकार को झुकना पड़ा और भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
5. अन्ना हजारे (लोकपाल आंदोलन)
* अनशन की अवधि: 12 दिन (अप्रैल 2011) और 13 दिन (अगस्त 2011)
* परिणाम: भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में हुए इस ऐतिहासिक जनांदोलन के आगे मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने संसद में लोकपाल बिल पर चर्चा करने और सैद्धांतिक सहमति देने के लिए अन्ना हजारे का अनशन तुड़वाया।
6. बाबा रामदेव (काला धन और भ्रष्टाचार विरोधी अनशन)
* अनशन की अवधि: 9 दिन (जून 2011)
* परिणाम: रामलीला मैदान में काले धन की वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए इस अनशन को पुलिसिया कार्रवाई (ऑपरेशन सिंदूर) द्वारा भले ही कुचला गया, लेकिन राष्ट्रव्यापी आक्रोश के कारण सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और नीतिगत स्तर पर दबाव झेलना पड़ा।
इतिहास गवाह है कि जब भी राज्य सत्ता लाठी, गोली और दमन के बल पर जनता की आवाज को दबाने की कोशिश करती है, तो अनशन और जनांदोलन और अधिक तीव्र हो जाते हैं। सोनम वांगचुंग और देश के युवाओं का यह वर्तमान संघर्ष इसी लंबी और गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपरा की अगली कड़ी है।

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