विपिन जोशी…
हरिनगरी चाय उद्योग का पतन: करोड़ों की सिंचाई योजना और उम्मीदें फाइलों में दफन, काश्तकार सड़क पर!
उत्तराखंड के ‘पहाड़ी चाय’ ब्रांड पर संकट के बादल, टी बोर्ड की उदासीनता से 400 परिवारों का भविष्य अंधकारमय।
हरिनगरी, कभी उत्तराखंड की शान रही और कौसानी की अंतरराष्ट्रीय मार्केट में 25,000 रुपये प्रति किलो तक बिकने वाली हरिनगरी की ‘प्रीमियम चाय’ अब अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। 2022-23 में मिनी चाय फैक्ट्री के रूप में शुरू हुआ यह सपना 2026 आते-आते एक बुरे दुस्वप्न में बदल गया है। टी बोर्ड की कथित लापरवाही और व्यवस्थागत अनियमितताओं ने न केवल चाय की क्वालिटी गिरा दी है, बल्कि 400 से अधिक परिवारों की आजीविका पर भी तलवार लटका दी है ।
हरिनगरी चाय काश्तकार समिति के अध्यक्ष और पूर्व प्रधान लक्ष्मण आर्या ने टी बोर्ड के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि, “टी बोर्ड ने मॉनिटरिंग पूरी तरह बंद कर दी है। जो प्रशिक्षण कभी यहां होने चाहिए थे, वे दूर कौसानी में सिमट गए हैं। आलम यह है कि बोर्ड का कोई सुपरवाइजर अब गांव का रुख तक नहीं करता।”
अध्यक्ष ने सबसे बड़ा सवाल नाबार्ड की 10 करोड़ रुपये की उस सिंचाई योजना पर उठाया है, जिसका लाभ हरिनगरी के किसानों तक आज तक नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पूछा, “नाबार्ड की 10 करोड़ की योजना कहां गई? इसका जवाब टी बोर्ड को देना होगा।”
“काम कम, भरण-पोषण मुश्किल”: महिला काश्तकारों का दर्द
चाय काश्तकार मधुली देवी का दर्द किसी को भी झकझोर सकता है। वे कहती हैं, “कभी महीने में 15 दिन का काम मिलता था, अब हमें मात्र 5 से 6 दिन का काम नसीब हो रहा है। अगर कार्य दिवस ऐसे ही घटाए गए, तो हम अपने बच्चों का पेट कैसे पालेंगे?”

टी बोर्ड की सफाई या लीपापोती?
इस पूरे मामले पर टी बोर्ड कौसानी के मैनेजर प्रमोद कुमार ने दलील दी कि, “उत्पादन के आधार पर काम दिया जाता है। हरिनगरी फैक्ट्री का सालाना टर्नओवर एक करोड़ है और नाबार्ड की सिंचाई योजना संचालित है।” हालांकि, मैनेजर के ये दावे धरातल पर दिख रहे आक्रोश के बिल्कुल विपरीत हैं। किसानों का साफ कहना है कि कागजों पर दिख रहा ‘टर्नओवर’ और हकीकत में उनकी खाली जेबें आपस में मेल नहीं खातीं।
मार्केट से गायब हो जाएगी ‘पहाड़ी चाय’
समिति के उपाध्यक्ष आनंद राम ने सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अगर टी बोर्ड की यही लापरवाही जारी रही, तो उत्तराखंड की प्रसिद्ध चाय जल्द ही बाजार से पूरी तरह गायब हो जाएगी। उन्होंने राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
सवाल अब भी वही है: क्या 10 करोड़ की सिंचाई योजना का लाभ किसानों को मिलेगा, या यह योजना भी चंद अधिकारियों और कागजों की भेंट चढ़ जाएगी? क्या प्रशासन हरिनगरी के इन चाय बागानों को फिर से संवार पाएगा?


















