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उत्तराखंड : पांचवी अनुसूची से परहेज़ क्यों

उत्तराखंड को पाँचवी अनुसूची में शामिल करने की कवायद फिर से जोड़ पकड़ने लगी है। उत्तराखंड एकता मंच बीस दिन की उत्तराखंड यात्रा में निकली है। सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता के अनुसार पांचवी अनुसूची की माँग तेज हो रहे है, क्या मौजूदा सरकार या 2027 में आने वाली सरकार पांचवी अनुसूची के पक्ष में होगी? क्या राजनैतिक दल इसे अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करेंगे ?
भारतीय संविधान की पाँचवी अनुसूची (अनुच्छेद 244(1)) उन राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए प्रावधान करती है जहाँ बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी निवास करती है। यह अनुसूची राज्यपाल को जनजातीय हितों की रक्षा के लिए विशेष विनियम बनाने, भूमि हस्तांतरण को विनियमित करने और जनजाति सलाहकार परिषद (TAC) के गठन का अधिकार देती है।
उत्तराखंड में पाँचवी अनुसूची लागू करने की मांग मुख्य रूप से राज्य के ‘मूल निवासियों’ द्वारा की जा रही है। इसके पक्ष में दिए जाने वाले तर्क इस प्रकार हैं:
विभिन्न विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का तर्क है कि 1972 से पहले उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ‘शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट एक्ट 1874’ जैसे कानून प्रभावी थे, जो जनजातीय पहचान और अधिकारों के संरक्षण में मदद करते थे। समर्थकों का मानना है कि इन कानूनों के हटने से स्थानीय संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण बढ़ा है।
आंदोलनकारियों का प्रमुख तर्क यह है कि पाँचवी अनुसूची लागू होने से राज्य के प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर स्थानीय लोगों का अधिकार सुनिश्चित होगा। यह बाहरी लोगों द्वारा भूमि अधिग्रहण और संसाधनों के दोहन को रोकने में एक कानूनी कवच के रूप में कार्य कर सकता है।
उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति और ‘खस’ (Khas) समुदाय की विशिष्ट जीवनशैली को संरक्षित करने के लिए इसे एक अनिवार्य माध्यम के रूप में देखा जा रहा है।
समर्थकों का कहना है कि इसके तहत स्थानीय लोगों को संसाधनों से जुड़े रोजगारों में प्राथमिकता मिल सकती है, जिससे पलायन जैसी समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
वर्तमान में, उत्तराखंड राज्य संविधान की पाँचवी अनुसूची के अंतर्गत ‘अनुसूचित क्षेत्र’ घोषित नहीं है। भारत के केवल 10 राज्यों (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना) में पाँचवी अनुसूची लागू है।
किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसके लिए राज्य सरकार की अनुशंसा और विशिष्ट जनसांख्यिकीय मानदंडों (जैसे आदिवासी आबादी का घनत्व, क्षेत्र का पिछड़ापन आदि) को पूरा करना आवश्यक होता है।
उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी का अनुपात उन राज्यों की तुलना में कम है जहाँ पाँचवी अनुसूची वर्तमान में लागू है। यह इस मांग को संवैधानिक रूप से जटिल बनाता है।
कानूनी और राजनीतिक बहस:
राज्य में इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है। जहाँ कुछ समूह इसे राज्य के अस्तित्व और पहचान के लिए आवश्यक मानते हैं, वहीं नीति निर्माताओं के समक्ष इसे लागू करने के लिए संवैधानिक मानदंडों की सीमाएँ एक बड़ी बाधा हैं।
उत्तराखंड में पाँचवी अनुसूची की मांग केवल एक संवैधानिक मांग नहीं, बल्कि यह राज्य के मूल निवासियों की अपनी जमीन और संस्कृति को बचाने की एक गहरी आकांक्षा का प्रतिबिंब है। यह विषय राज्य की नीति निर्धारण और भविष्य की सामाजिक-राजनीतिक दिशा के लिए एक महत्वपूर्ण विमर्श बन चुका है।
विपिन जोशी

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