विपिन जोशी, स्वर स्वतंत्र …
विश्व पर्यावरण दिवस न केवल एक वार्षिक आयोजन है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व के प्रति हमारी जिम्मेदारी को याद दिलाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। 5 जून, 1974 को पहली बार मनाए गए इस दिवस की प्रासंगिकता आज के समय में पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
यह दिन आम जनमानस को पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति जागरूक करने का सबसे बड़ा मंच है। यह सरकारों और कॉरपोरेट जगत को पर्यावरण अनुकूल नीतियां बनाने और उन पर अमल करने के लिए बाध्य करने का एक अवसर प्रदान करता है। पर्यावरण संरक्षण कोई एक व्यक्ति या देश नहीं कर सकता। यह दिवस विश्व स्तर पर एकजुट होकर ठोस कदम उठाने की प्रेरणा देता है। वर्तमान दौर के ज्वलंत पर्यावरणीय मुद्दे
आज हम जिन पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनमें से कुछ सबसे गंभीर मुद्दे निम्नलिखित हैं:
वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, समुद्र के जल स्तर का बढ़ना और मौसम चक्र का बिगड़ना सबसे चिंताजनक है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में इसका सीधा असर बार-बार होने वाले भूस्खलन और बेमौसम बारिश के रूप में देखा जा रहा है।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक हमारी मिट्टी, नदियों और महासागरों में जहर की तरह घुल चुका है। सूक्ष्म प्लास्टिक अब हमारे खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन चुके हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक हैं।
तेजी से शहरीकरण और अनियोजित विकास के कारण जल स्रोतों का सूखना एक गंभीर समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब पानी की कमी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभर रही है।
वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के विनाश से कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ने से खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है। औद्योगीकरण और वाहनों के धुएं के कारण हवा में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच गया है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। निर्माण कार्यों, विशेषकर पहाड़ों में सड़कों के चौड़ीकरण और बड़े ढांचागत प्रोजेक्ट्स के दौरान पर्यावरण का ध्यान न रखना एक ज्वलंत मुद्दा है, जिसके दूरगामी परिणाम प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आते हैं।
जरा सोचें, दुनिया के 50 सबसे ज़्यादा तापमान वाले शहर भारत में हैं । मई 2026 में अधिकांश शहरों में तापमान 47 डिग्री को पार कर गया था। उत्तर प्रदेश के बांदा में 1400 ट्रांसफार्मर को जलने से बचाने के लिए उन पर पानी डालना पड़ा था । अब भविष्य के लिए पर्यावरण को बचाने की जरूरत नहीं अब तो वर्तमान के लिए नई पीढ़ी के लिए पर्यावरण को बचाना है ।
भारतीय जीवन दर्शन तो प्रकृति प्रेम से परिपूर्ण है । यहाँ नदियों को माता का दर्जा प्राप्त है और नमामि गंगे परियोजना में सबसे बड़े घोटाले हुए हैं बावजूद उसके नदियाँ बीमार हैं, गंदगी और अतिक्रमण का शिकार हैं . एक और डरावना आंकड़ा सामने आया है संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार तापमान बढ़ने से भारत में धान का उत्पादन 40 फीसदी और गेहूं का उत्पादन 34 फीसदी तक घट सकता है . यह चिंता का सबब तो है . आज विश्व पर्यावरण दिवस पर सेमिनार होंगे , चाय कॉफी नमकीन बिस्किट के साथ विचार विमर्श होगा वृक्षारोपण के बड़े दावे भी होंगे लेकिन धरातल में स्थिति इंच भर भी नहीं बदलेगी .
प्रकृति बहस विमर्श नहीं करती है, चेतावनी देती है टूटते ग्लेशियर हो या विस्तार लेता समुद्र या फिर धधकते वन सब संकेत और चेतावनी का समन्वय है लेकिन विकास की रेस में और फ़र्ज़ी आंकड़ों के खेल से ध्यान भटकाने की मुहिम भी सरकार करती है. इसका असर हमारे सामने वैश्विक ताप वृद्धि और सिमटती नदियों और पिघलते हिमालय के रूप में मौजूद है .

पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी जीवनशैली में बदलाव लाने की प्रक्रिया है। ‘चरायवेति चरायवेति’ की भावना के साथ, हमें अपनी परंपराओं और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन बनाते हुए एक सतत भविष्य की ओर बढ़ना होगा। हमें स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, जैसा कि आप अपने क्षेत्र में जागरूक पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के माध्यम से कर रहे हैं।
यह दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रकृति मनुष्य पर निर्भर नहीं है, बल्कि मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है।


















