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छोटे कद के लच्छू की बड़ी छलांग

विपिन जोशी
छोटे कद के लच्छू की बड़ी छलांग: सिस्टम से लड़कर गांव तक पहुंचाई सड़क
गरुड़। कहते हैं कि कद छोटा होने से इरादे छोटे नहीं हो जाते। इस बात को सच कर दिखाया है क्षेत्र पंचायत सदस्य लक्ष्मण कुमार उर्फ ‘लच्छू पहाड़ी’ ने। गरुड़ क्षेत्र के सौलिया बजाणी से मिजोलिया तक की 3 किलोमीटर लंबी ग्रामीण सड़क का आज आखिरकार शिलान्यास हो गया। यह सिर्फ एक सड़क का पत्थर नहीं है, बल्कि लच्छू पहाड़ी के उस वादे की जीत है जो उन्होंने जनता से किया था।
इस सड़क की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। चुनाव के दौरान लच्छू पहाड़ी ने ग्रामीणों से वादा किया था कि वे सड़क दिलवाकर रहेंगे। लेकिन चुनाव जीतने के बाद जब वे जिला मुख्यालय पहुंचे, तो उन्हें निराशा हाथ लगी। सिस्टम की बेरुखी से हार मानने के बजाय, लच्छू ने सीधे कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत का दरवाजा खटखटाया। उच्च अधिकारियों को लच्छू की बात और ग्रामीणों का दर्द समझ आया, और नतीजा आज सबके सामने है।
“भले ही जिला स्तर से लच्छू पहाड़ी को इस परियोजना के लिए सहयोग न मिला हो, लेकिन उनके अडिग हौसले और उच्च अधिकारियों की कृपा दृष्टि ने आज ग्रामीणों का सालों पुराना सपना सच कर दिया।”
आज जैसे ही फावड़ा चला और नारियल फूटा, ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए क्षेत्र के तमाम दिग्गज नेता और ग्रामीण जुटे।
ये रहे शामिल –
शोभा आर्या (जिला पंचायत अध्यक्ष, बागेश्वर)
दीपक खुलबे(जिला पंचायत सदस्य)
लक्ष्मण कुमार ‘लच्छू पहाड़ी’ (क्षेत्र पंचायत सदस्य)
विक्रम सिंह बिष्ट (ग्राम प्रधान)
ब्लॉक प्रमुख गरुड़

बुलन्द इरादों के धनी लच्छू ने वादा पूरा किया
बुलन्द इरादों के धनी लच्छू ने वादा पूरा किया

इन सभी जनप्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से विधि-विधान के साथ भूमि पूजन कर विकास कार्य का औपचारिक आगाज किया।
उम्मीदों की नई राह
इस मौके पर दयाकृष्ण जोशी, मनोज रावल, प्रताप सिंह, गोपाल सिंह, मंगल राणा और राजू नेगी सहित भारी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह 3 किलोमीटर की सड़क सिर्फ डामर की पट्टी नहीं, बल्कि इस पूरे इलाके के संपर्क, आवागमन और आर्थिक विकास की नई जीवनरेखा बनेगी। अधिकारियों और ठेकेदारों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि काम में तेजी लाई जाए ताकि जल्द से जल्द लोग इस सड़क पर फर्राटा भर सकें।
सच ही है… जब विकास की ताल लच्छू पहाड़ी जैसे जनसेवक ठोकते हैं, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं!

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