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प्राचार्य चक्षुस्पति अवस्थी की बड़ी घोषणा

विपिन जोशी.
विज्ञान सिर्फ किताबों में नहीं, आचरण में है: बागेश्वर और अल्मोड़ा डायट में अब प्लास्टिक-नैपकिन पर पूर्ण प्रतिबंध
बागेश्वर/अल्मोड़ा। अक्सर विज्ञान की बड़ी-बड़ी कार्यशालाओं में पर्यावरण बचाने पर लंबे-चौड़े भाषण होते हैं, लेकिन कार्यक्रम खत्म होते ही वहाँ प्लास्टिक के डिस्पोजल कप और कचरे का ढेर लग जाता है। उत्तराखंड के बागेश्वर और अल्मोड़ा जिलों ने इस ढर्रे को तोड़कर पूरे देश के सामने एक अनूठी मिसाल पेश की है।
अब इन दोनों जिलों के जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) की रसोई और कार्यशालाओं में प्लास्टिक, थर्माकोल के डिस्पोजल और नैपकिन पेपर का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया गया है।

प्राचार्य डायट बागेश्वर ने ली अनोखी पहल
प्राचार्य डायट बागेश्वर ने ली अनोखी पहल

बागेश्वर डायट: प्राचार्य चक्षुस्पति अवस्थी की बड़ी घोषणा
‘साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसायटी’ की एक विज्ञान कार्यशाला के दौरान बागेश्वर डायट के प्राचार्य चक्षुस्पति अवस्थी ने यह ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने साफ किया कि संस्थान के भीतर होने वाले किसी भी कार्यक्रम या रसोई में अब कचरा बढ़ाने वाली इन चीजों को जगह नहीं मिलेगी। विज्ञान का मतलब सिर्फ थ्योरी पढ़ना नहीं, बल्कि उसे अपने व्यवहार में लाना है।
अल्मोड़ा डायट: प्रो. एच.सी. वर्मा की प्रेरणा से बदला नियम
दूसरी तरफ, अल्मोड़ा डायट में भी इस व्यवस्था को सख्ती से लागू कर दिया गया है। अल्मोड़ा डायट के प्राचार्य एल.एम. पांडे ने बताया कि राज्य में चल रही ‘विज्ञान प्रयास यात्रा’ के दौरान वे देश के प्रख्यात भौतिक विज्ञानी पद्मश्री डॉ. एच.सी. वर्मा के वैज्ञानिक और सादगी भरे प्रयासों से बेहद प्रभावित हुए। इसी प्रेरणा के चलते अल्मोड़ा डायट में भी डिस्पोजल और नैपकिन के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
नई व्यवस्था: अपनी थाली, अपना कप और खुद की सफाई
अब इन संस्थानों में चाय-कॉफ़ी के लिए स्टील के कप और भोजन के लिए स्टील की थालियों का उपयोग किया जाएगा। सबसे खास बात यह है कि कार्यशाला में आने वाले शिक्षक, शोधार्थी या कोई भी प्रतिभागी उपयोग के बाद अपनी थाली और कप को स्वयं साफ करेंगे।
“जब तक हम खुद बदलाव की शुरुआत नहीं करेंगे, तब तक समाज को जागरूक नहीं कर सकते। अपनी थाली खुद धोना श्रम के सम्मान और पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को दर्शाता है।”

इस छोटे से दिखने वाले कदम के पीछे पर्यावरण संरक्षण का मजबूत संदेश छिपा है। हर साल कार्यशालाओं में हजारों की संख्या में फेंके जाने वाले प्लास्टिक कप प्लास्टिक कचरे को बढ़ावा देते हैं अब डिस्पोजल कप और प्लेटों से मुक्ति मिलेगी।
नैपकिन पेपर बनाने में भारी मात्रा में पेड़ों को काटा जाता है और पानी बर्बाद होता है। इस पर रोक लगाकर पर्यावरण को सीधा फायदा पहुँचेगा। खुद के बर्तन खुद साफ करने से एक स्वस्थ और वीआईपी-कल्चर से मुक्त माहौल तैयार होगा।
विज्ञान जब तक हमारी जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनता, तब तक वह अधूरा है। बागेश्वर और अल्मोड़ा डायट ने कागजी दावों से इतर ज़मीन पर काम करके दिखाया है। उम्मीद है कि देवभूमि के अन्य सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान भी इस ‘वैज्ञानिक और पर्यावरण-हितैषी’ पहल से सीख लेंगे।

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