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कबाड़ से जुगाड़ और विज्ञान का जादू : प्रो. एच. सी. वर्मा

कबाड़ से जुगाड़ और विज्ञान का जादू: उत्तराखंड की सड़कों पर प्रो. एच.सी. वर्मा की ‘विज्ञान यात्रा’
क्या विज्ञान सिर्फ मोटी-मोटी किताबों और भारी-भरकम शब्दों में बंद है? या फिर विज्ञान हमारे आस-पास, हमारी रसोई में और हमारे रोजमर्रा के जीवन में सांस लेता है? इसी बात को साबित करने के लिए उत्तराखंड के पहाड़ों और मैदानों में इन दिनों विज्ञान की एक अनोखी अलख जागी है।
देश के जाने-माने भौतिक विज्ञानी, आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और पद्मश्री डॉ. एच.सी. वर्मा के नेतृत्व में ‘उत्तराखंड में प्रयोग यात्रा: सरिता’ नाम का एक शानदार अभियान चल रहा है। 12 मई से शुरू हुई यह यात्रा 1 जून तक चलेगी, जिसका मकसद विज्ञान को रटने के बजाय उसे समझने और जीने का तरीका सिखाना है।

विज्ञान शिक्षण सरल और रोचक कैसे हो : प्रो. एच सी वर्मा
उत्तराखंड में विज्ञान यात्रा से अलख जगाते प्रोफेसर एच सी वर्मा

यात्रा के दौरान भीमताल के ‘डायट’ (DIET) में शिक्षकों के लिए दो दिनों की एक खास वर्कशॉप रखी गई। यहाँ प्रो. वर्मा ने शिक्षकों को एक नया नजरिया दिया। उन्होंने कहा कि विज्ञान को किताबों से निकालकर बच्चों के दैनिक जीवन से जोड़ना होगा।
“बिना गणित के भौतिक विज्ञान आगे नहीं बढ़ सकता।”
प्रो. एच.सी. वर्मा
उन्होंने अपनी नई किताब ‘कैलकुलस द प्रिंसेस ऑफ मैथमेटिक्स’ के जरिए समझाया कि गणित और भौतिकी का रिश्ता कितना गहरा है। इसी मौके पर शिक्षकों की मदद के लिए एक ‘विज्ञान गतिविधि केंद्र’ की शुरुआत भी की गई।
नैनीताल के ‘भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय’ में जब प्रो. वर्मा पहुँचे, तो वहाँ हजार से ज्यादा बच्चे और शिक्षक मौजूद थे। प्रो. वर्मा ने किसी महंगी लैब के बिना, सिर्फ बेकार पड़ी चीजों (लो-कॉस्ट सामग्री) से भौतिक विज्ञान के कई मजेदार प्रयोग करके दिखाए। उन्होंने बच्चों को समझाया कि असली वैज्ञानिक वही है जो स्थानीय और कम से कम संसाधनों में कुछ नया कर दिखाए। उन्होंने बच्चों से अपील की कि वे तकनीक का इस्तेमाल अपनी धरती को प्रदूषण मुक्त और सुंदर बनाने के लिए करें।
इसी कार्यक्रम में मौसम वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह बिष्ट ने भी बच्चों को जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति जागरूक किया।
इस यात्रा को सफल बनाने में भवानी शंकर कांडपाल, सुरेश चंद्र आर्य, और डॉ. शैलेंद्र सिंह धपोला जैसे कई शिक्षाविदों और शिक्षकों की पूरी टीम दिन-रात जुटी हुई है।

यह यात्रा सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के ग्रामीण और शहरी बच्चों के भीतर छुपे ‘वैज्ञानिक’ को जगाने का एक महा-अभियान है। जब प्रो. वर्मा जैसे दिग्गज ज़मीन पर उतरकर बच्चों को कबाड़ से विज्ञान सिखाते हैं, तो समझ आता है कि शिक्षा का असली मतलब क्या है।
विपिन जोशी,संपादक ‘स्वर स्वतंत्र’

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