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पहाड़ में ‘बीमार’ स्वास्थ्य व्यवस्था

पहाड़ में ‘बीमार’ स्वास्थ्य व्यवस्था: चार डॉक्टरों के भरोसे 101 ग्रामसभाओं वाली कत्यूर घाटी
– विपिन जोशी, गरुड़ (कत्यूर घाटी)
उत्तराखंड राज्य स्थापना के ढाई दशक बाद भी पर्वतीय अंचलों में स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। सरकारें भले ही सूबे में स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के बड़े-बड़े दावे करें, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद चिंताजनक और गंभीर बनी हुई है। इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण है बागेश्वर जनपद की ऐतिहासिक कत्यूर घाटी, जहां की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था इस समय वेंटिलेटर पर दिखाई दे रही है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र किसी भी ग्रामीण या पर्वतीय क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वर्तमान में उत्तराखंड में कुल 90 से अधिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्वीकृत हैं, लेकिन डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी के कारण ये केंद्र महज ‘रेफरल सेंटर’ बनकर रह गए हैं। प्रांतीय चिकित्सा सेवा के आंकड़ों और हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदेश में डॉक्टरों के कुल स्वीकृत पदों में से लगभग 40% से 50% पद रिक्त चल रहे हैं। पर्वतीय जिलों में तो विशेषज्ञ डॉक्टरों (सर्जन, फिजिशियन, बाल रोग विशेषज्ञ) के 60% से अधिक पद खाली पड़े हैं।
इस राज्यव्यापी संकट का सीधा असर अब कत्यूर घाटी में देखने को मिल रहा है ।
101 ग्रामसभाएं, महज 4 डॉक्टर , कत्यूर घाटी की 101 ग्रामसभाओं की विशाल आबादी पूरी तरह से मोहन सिंह मेहता सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, बैजनाथ पर निर्भर है। लेकिन इस मुख्य अस्पताल में महज चार चिकित्सक कार्यरत हैं। विशेषज्ञता के नाम पर आधी-अधूरी व्यवस्था से जनता हलकान है । इन चार डॉक्टरों में से भी एकमात्र विशेषज्ञ चिकित्सक सप्ताह में केवल तीन दिन ही बैजनाथ में उपलब्ध रहते हैं, जबकि शेष तीन दिन उन्हें जिला मुख्यालय या अन्यत्र सेवाएं देनी पड़ती हैं। ऐसे में कत्यूर घाटी के ग्रामीणों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
बैजनाथ अस्पताल न केवल स्थानीय जनता बल्कि चमोली जनपद के सीमांत क्षेत्रों जैसे ग्वालदम, थराली, और देवाल के मरीजों के लिए भी प्राथमिक उपचार का एकमात्र सहारा है। इस लिहाज से अस्पताल पर दबाव दोगुना है, लेकिन संसाधन आधे भी नहीं हैं।
चुनावी घोषणाएं बनाम धरातल का सच जानने की कोशिश की तो पता चला कि पर्वतीय क्षेत्रों में जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, घोषणाओं की झड़ी लग जाती है। हाल ही में कपकोट ब्लॉक में उप जिला चिकित्सालय की स्थापना और गरुड़ में स्वास्थ्य सेवाओं को उच्चीकृत करने की बड़ी-बड़ी बातें शासन-प्रशासन के स्तर पर हुई हैं। लेकिन स्थानीय जनता के मन में अब यह बड़ा सवाल कौंध रहा है कि क्या ये घोषणाएं 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले धरातल पर उतरेंगी या फिर हर बार की तरह इन्हें भी ‘चुनावी ठंडे बस्ते’ में डाल दिया जाएगा?
उत्तराखंड के प्रत्येक गांव से आज यही सवाल उठ रहा है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत के प्रति आखिर कब संवेदनशील होगी?
अभी हाल ही में अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया और द्वाराहाट में हुए उग्र स्वास्थ्य आंदोलनों की यादें ताजा हैं, जहां जनता को डॉक्टरों की तैनाती के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा था। कत्यूर घाटी भी अब उसी राह पर आगे बढ़ती दिख रही है।
बैजनाथ अस्पताल की बदहाली और चिकित्सकों की कमी को लेकर स्थानीय जनता का आक्रोश अब सड़कों पर आने लगा है। इसी क्रम में यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने गरुड़ में उपजिलाधिकारी के माध्यम से सरकार को ज्ञापन सौंपकर स्वास्थ्य व्यवस्था सुचारू करने की मांग की है।
वर्तमान में अस्पताल में फिजिशियन, दंत चिकित्सक, रेडियोलॉजिस्ट और सर्जन जैसे महत्वपूर्ण विशेषज्ञों के पद पूरी तरह रिक्त हैं। इसके कारण गंभीर रूप से बीमार मरीजों को प्राथमिक उपचार के नाम पर सीधे जिला अस्पताल या सुदूर मैदानों (हल्द्वानी/बरेली) के लिए रेफर कर दिया जाता है। इससे गरीब परिवारों पर भारी आर्थिक, मानसिक और शारीरिक बोझ पड़ रहा है।”
— दिवाकर तिवारी, NSUI नेता

भौगोलिक रूप से विषम और ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण कत्यूर घाटी के लोगों के लिए इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का सुचारू होना जीवन-मरण का प्रश्न है। विशेषज्ञों की कमी से जनता को गुणवत्तापूर्ण इलाज नहीं मिल पा रहा है। हमारी सरकार से मांग है कि जनहित को देखते हुए बैजनाथ में फिजिशियन, सर्जन और रेडियोलॉजिस्ट की तुरंत नियुक्ति की जाए। यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो क्षेत्र की जनता उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।”
— नरेन्द्र सिंह बिष्ट, ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष, गरुड़

जनाक्रोश में शामिल प्रमुख चेहरे
स्वास्थ्य सुविधाओं की बहाली की इस मांग को लेकर क्षेत्र के युवा और वरिष्ठ नेता एकजुट हो चुके हैं। एसडीएम को ज्ञापन सौंपने के दौरान मुख्य रूप से युवा कांग्रेस गरुड़ के ब्लॉक अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रावत, विशाल फर्सवान, लक्ष्मण आर्या, मोहन सिंह, विरेन्द्र, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी गरुड़ के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह बिष्ट, एनएसयूआई ब्लॉक अध्यक्ष (गरुड़) भानु रावत, दिवाकर तिवारी, प्रकाश चंद्र आर्या, एस.पी. सिंह, हरेंद्र जीना, दीपक कुमार, अनिल कुमार और भुवन बिष्ट सहित दर्जनों क्षेत्रवासी मौजूद रहे।

मरीजों से घिरे डॉक्टर
मरीजों से घिरे डॉक्टर

पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी के साथ-साथ यदि पहाड़ की सेहत को भी बचाना है, तो सरकार को कत्यूर घाटी जैसी घनी आबादी वाले क्षेत्रों की सुध लेनी ही होगी। देखना यह है कि बैजनाथ अस्पताल को उसके अधिकार के डॉक्टर मिलते हैं या फिर कत्यूर की जनता को भी चौखुटिया की तरह सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

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