आर्थिक संकट, ‘रोल प्ले’ और पारदर्शिता का सवाल: देशभक्ति के चश्मे से नहीं, ठोस रणनीति से संभलेगा बाज़ार
– विपिन जोशी, ‘स्वर स्वतंत्र’
भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति और लगातार गोते खाता बाज़ार किसी अचानक आई आपदा का परिणाम नहीं हैं। जब देश का बाज़ार मंदी, महंगाई और घटती क्रय शक्ति से जूझ रहा हो, तब नीतिगत खामियों को छिपाने के लिए केवल वैश्विक परिस्थितियों का बहाना बनाना तर्कसंगत नहीं लगता। आज यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि ईरान युद्ध या वैश्विक तनाव ही इस पूरी बदहाली के पीछे हैं, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। असल सवाल नीयत, नीति और पारदर्शिता का है।
अचानक नहीं आई यह गिरावट
अर्थव्यवस्था की बुनियाद पिछले कुछ समय से लगातार कमजोर हो रही थी। इसे हम कुछ बेहद गंभीर और प्रामाणिक आंकड़ों से समझ सकते हैं – विदेशी पूंजी का पलायन, पिछले छह वर्षों में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) में नेगेटिव वृद्धि दर्ज की गई है। चिंताजनक बात यह है कि महज पिछले चार महीनों में करीब 2 लाख करोड़ रुपए देश से बाहर चले गए हैं। विदेशी निवेशकों का यह अविश्वास घरेलू बाज़ार की कमर तोड़ रहा है।
रुपए का ऐतिहासिक अवमूल्यन-वैश्विक स्तर पर भारतीय रुपए की गिरावट बेहद तेज रही है। अगर तुलनात्मक रूप से देखें, तो तुर्किए की मुद्रा के बाद भारतीय रुपया दुनिया में सबसे ज्यादा यानी करीब सवा बारह फीसदी (12.25%) तक टूटा है।
विरोधाभासों की अर्थनीति, आरबीआई खरीदे सोना, जनता से संयम की अपील?
हाल ही में प्रधानमंत्री ने देश की जनता से सोना न खरीदने की अपील की है, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो सके। लेकिन यह अपील एक बड़े विरोधाभास को जन्म देती है। एक तरफ आम जनता से सोना न खरीदने को कहा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक (RBI) ने पिछले साल खुद 168 टन सोना खरीदा है।
यह कैसी अर्थनीति है जहां सरकार या सरकारी तंत्र के लिए नियम अलग हैं और देश के आम नागरिकों के लिए अलग? यदि आर्थिक राष्ट्रहित का तकाजा है, तो यह नियम सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
जबकि बाज़ार का सीधा गणित है जब तक आम आदमी के हाथ में पैसा नहीं होगा और नीतियों में पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक सिर्फ़ अपीलों से बाज़ार में रौनक नहीं आएगी ।
एक बड़ा यक्ष प्रश्न यह भी उठता है कि देश में ‘सब चंगा सी’ का नारा सिर्फ चुनावों तक ही क्यों सीमित रहता है? चुनाव संपन्न होते ही अचानक सारे आर्थिक संकट सतह पर क्यों आ जाते हैं? महंगाई की मार क्यों उजागर होने लगती है ? क्या राष्ट्रहित और आर्थिक समझदारी सिर्फ गैर-चुनावी दौर की जागीर हैं?
इतने बड़े आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़े होने के बावजूद सरकार द्वारा निम्नलिखित कदम क्यों नहीं उठाए जाते ।देश की आर्थिक स्थिति पर आम सहमति बनाने के लिए कोई सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलाई जाती?
संकट के स्थाई समाधान के लिए संसद में खुली और गंभीर चर्चा से क्यों बचा जा रहा है?
जनता से तेल के संयमित उपयोग की बात कही जा रही है, जो ठीक भी है। लेकिन सरकार यह सार्वजनिक क्यों नहीं करती कि देश के पास वास्तव में कितने दिनों का रणनीतिक तेल भंडारण शेष है? इस डेटा को छिपाकर पारदर्शिता का अभाव क्यों पैदा किया जा रहा है?

संकट के इस दौर में अब बचत और राष्ट्रहित का एक नया ‘रोल प्ले’ देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री के सुरक्षा घेरे या फ्लीट को कम करके तेल बचाने का संदेश देने की कोशिश की जा रही है। यहाँ दो ही बातें हो सकती हैं— या तो यह कदम सिर्फ एक दिन का प्रतीकात्मक नाटक है, या फिर यह देश के शीर्ष पद की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। अगर फ्लीट छोटी करना ही वास्तविक समाधान है, तो इसे केवल संकट काल के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए सभी माननीयों पर अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।
यही स्थिति मुख्यमंत्रियों, जजों या बड़े नौकरशाहों की भी है। एक दिन साइकिल या इलेक्ट्रिक गाड़ी से दफ्तर आकर मीडिया में सुर्खियां बटोरने से देश का तेल संकट दूर नहीं होने वाला। यदि पर्यावरण और तेल की बचत को लेकर इतनी ही चिंता है, तो इसे रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाता?
ल्बबोलुआब यह है कि देश की जनता संकट के समय हमेशा सरकार के साथ खड़ी रही है और आज भी मन से सहयोग करने को तैयार है, बशर्ते सरकार देश के समक्ष वास्तविक आर्थिक स्थिति का ब्यौरा और तेल भंडारण के असली आंकड़े पूरी पारदर्शिता के साथ साझा करे।
हर आर्थिक विफलता या संकट को ‘देशभक्ति’ और ‘त्याग’ से जोड़ देना अब बंद होना चाहिए। माननीयों की ‘तेल बचाओ नौटंकी’ हेडलाइंस तो बना सकती है, लेकिन गिरती अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल सकती। इसके लिए हेडलाइंस बदलने वाली राजनीति की नहीं, बल्कि एक ठोस, पारदर्शी और दूरदर्शी आर्थिक रणनीति की जरूरत है।


















