कृषि का बदलता परिदृश्य: आत्मनिर्भरता से मशीनीकरण के चक्रव्यूह तक
विपिन जोशी, स्वर स्वतंत्र
पहाड़ की खेती, जो कभी आपसी सहयोग और पशुधन के अटूट रिश्ते पर टिकी थी, आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। गरुड़ घाटी में अचानक हुई बारिश और उससे उपजी किसानों की बेबसी इस बदलाव के स्याह पक्ष को उजागर करती है। यदि हम पारंपरिक कृषि और आधुनिक मशीनीकृत कृषि की तुलना करें, तो परिदृश्य कुछ इस प्रकार उभरता है:
पुराने समय में पहाड़ की खेती का केंद्र पशुधन था। बैल न केवल खेत जोतने के काम आते थे, बल्कि गेहूं की मड़ाई में भी उनकी मुख्य भूमिका होती थी। आज गरुड़ घाटी समेत कई पर्वतीय क्षेत्रों में बैलों की जगह छोटे ट्रैक्टरों और थ्रेसर ने ले ली है।
मशीनों ने शारीरिक श्रम तो कम किया है, लेकिन किसानों को पूरी तरह से बाहरी संसाधनों और ईंधन पर निर्भर कर दिया है।
पारंपरिक खेती में बीज, खाद (गोबर) और श्रम स्थानीय स्तर पर उपलब्ध था। आज स्थिति इसके उलट है.
जहाँ पहले गेहूँ की मड़ाई आपसी सहयोग से हो जाती थी, अब एक घंटे के 500 से 700 रुपये देने पड़ रहे हैं। छोटे किसानों के लिए यह लागत उनकी कुल उपज के मूल्य से भी अधिक हो रही है।

वर्तमान में पूरी कृषि प्रक्रिया पेट्रोल और डीजल पर टिकी है। ऐसे में ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर किसान की थाली पर असर डाल रही हैं।
मौसम की मार और तकनीकी सीमाएं
प्रकृति का मिजाज हमेशा से अनिश्चित रहा है, लेकिन मशीनी युग में इसके खतरे बढ़ गए हैं। बेमौसमी बरसात ने किसानों की चिंताएं बढ़ाई हैं.
थ्रेसर संचालक गीले गेहूं की मड़ाई से इनकार कर रहे हैं, जिससे बारिश के कारण कटी हुई फसल के बर्बाद होने का डर बढ़ गया है। पारंपरिक तरीके (बैल या हाथ से मड़ाई) में किसान स्थिति के अनुसार सामंजस्य बिठा लेता था, लेकिन मशीनें केवल आदर्श परिस्थितियों में ही काम करती हैं।
किसान रमेश सिंह की बात में गहरा दर्द और सच्चाई छिपी है। पहले खेती में पड़्याल (आपसी मदद) की संस्कृति थी। मशीनीकरण ने लोगों को एकाकी बना दिया है। आपसी समन्वय की कमी ने संकट के समय किसानों को और अधिक असहाय कर दिया है।
पहाड़ में बिना पशुपालन के खेती करना केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक रूप से भी कठिन होता जा रहा है। गरुड़ घाटी के किसानों की निराशा यह संकेत देती है कि हमें आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान के बीच एक संतुलन बनाने की जरूरत है।
किसानो के स्वर
बसंत बल्लभ- खेती केवल तकनीक का खेल नहीं है, यह मिट्टी, मवेशी और मनुष्य के आपसी तालमेल का नाम है।
किशन सिंह- पहाड़ में बिना पशुपालन के खेती करना केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक रूप से भी कठिन होता जा रहा है। जंगली जानवरों का भय तो था ही अब डीजल पेट्रोल की बढ़ती कीमतें भी डरा रही हैं ।
पुष्पा देवी – मशीन से खेती महंगी हो गई है , हल बेल हमने छोड़ दिए हम न इधर के रहे न उधर के। थ्रेसर वालों की मनमर्जी और पेट्रोल डिजल पर हमारा सारा काम निर्भर हो गया ।
बारिश की चेतावनी ने आज भले ही भय पैदा किया हो, लेकिन यह समय इस पर चिंतन करने का भी है कि क्या हम विकास की दौड़ में अपनी आत्मनिर्भरता कहीं पीछे तो नहीं छोड़ आए?


















