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गरुड़ गंगा और गोमती उफान पर

विपिन जोशी…

प्रथम दृष्टया देखने पर गरुड़ क्षेत्र की ये तस्वीरें सामान्य लग सकती हैं। फिलहाल अभी तक किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं हुआ है, उम्मीद करते हैं आपदा का यह दौर अब कहीं भी नुकसान न पहुंचाएगा। लेकिन बीते दिनों हिमाचल, और उत्तरकाशी की घटना ने नदियों और पहाड़ों के साथ किए अत्याचार को अब मुखरता से सार्वजनिक किया है। गरुड़ में गोमती नदी उफान पर है तो गरुड़ गंगा ने भी अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है। गरुड़ गंगा के किनारे बने मकानों को खतरा हो सकता है। सतर्क रहने की आवश्यकता है। गरुड़ पार्किंग भी अब नदी की लहरों के बीच खड़ी है। पार्किंग निर्माण में फिलहाल नैनीताल हाईकोर्ट की रोक है।

प्रातः 10 बजे तक देवनाई चौखुटिया गरुड़ मोटर मार्ग अवरुद्ध हो चुकी थी। छत्यानि गरुड़ रोड भी अवरुद्ध है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि आज दोपहर तक जेसीबी पहुंच जाएगी। मौसम विभाग के एलर्ट के अनुसार आज पूरे दिन भर बारिश की संभावना है। ऐसे में सतर्क रहें और सुरक्षित रहें।

क्यों बन जाती है आपदा विकराल ? क्या यह सच में प्राकृतिक आपदा है? मानव अपनी समझदारी से आपदा के नुकसान को कम नहीं कर सकता ?

दरअसल विकास के नाम पर उत्तराखंड के नाजुक पहाड़ों के साथ जिस प्रकार का बलात व्यवहार किया जा रहा है वह क्षमा योग्य नहीं है। आखिरकार विगत दो दशकों में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से बेतहाशा नुकसान क्यों हो रहा है ? इसके पीछे अनियंत्रित अवैज्ञानिक प्राकृतिक दोहन तो नहीं । पहाड़ों का सीना चीर नदियों को पाट विकास की पटकथा लिखने वाले विकास के पीछे छिपे विनाश को क्यों नहीं देख पाते होंगे यह एक गम्भीर सवाल है। आज केदार आपदा के बाद धराली, उत्तरकाशी में तबाही आई है। लेकिन इस तबाही को प्राकृतिक आपदा का चोला पहना कर पुनः विकास और दोहन को ही मजबूत किया जाएगा। समाधान क्या होगा , कैसे आपदा ग्रस्त नुकसान को कम किया जा सकता है इस ओर ध्यान केंद्रित करना जरूरी हैं।

उत्तरकाशी आपदा के जान माल की क्षति का आकलन देर सवेर पता चल ही जाएगा। स्वर स्वतंत्र को और से सभी मृतकों को श्रद्धांजलि और उनकी आत्मिक शांति के लिए प्राथना करते हैं। ◊

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