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पंचायत चुनाव तब और अब : विपिन जोशी

पंचायत चुनाव की सरगर्मियां चरम पर हैं। डिजिटल प्रचार अभियान ने चुनाव प्रचार को आकर्षक बनाया है बदलते दौर में चुनाव प्रचार के तौर तरीके भी बदल गए।
हिंदुस्तान समाचार ने चुनाव प्रचार की इस बदली हुई परिस्थिति को समझने के लिए अपने जीवन के लगभग आठ दशक जी चुके वरिष्ठ नागरिकों से चर्चा की।
69 वर्षीय तानीखेत निवासी जगदीश बिष्ट ने बहुत उत्साहित होते हुए कहा कि अब चुनाव बहुत बदल गए हैं। आज से पचास साल पहले गांव के मुद्दे कुछ और थे। प्रत्याशी वोटर का रिश्ता भी बड़ा सरल था। चमक दमक नहीं थी। प्रत्याशी वोटर के घर रूखी सूखी खाकर अपनी बात कह कर चला जाता। न बड़े वादे न आश्वाशन। गांव के सयाने लोग भी तय करते थे कि कौन बनेगा प्रधान। अब कौन सुनता है । हल्ला नहीं था वोटर ही ईमानदार प्रत्याशी का प्रचार भी करता था। अब विधान सभा चुनाव जैसा हो गया पंचायत चुनाव। अब तो पव्वा पिलाने वाले से ज्यादा वोट अद्धा पिलाने वाले को और अद्धा पिलाने वाले से बोतल पिलाने वाले को ज्यादा वोट मिलते हैं। लौकी का तम्बूरा बना कर माइक की तरह उपयोग करते थे। कत्यूर घाटी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व गुमान सिंह हुड़के की थाप पर वोट मांगते थे।
86 वर्षीय टीट बाजार निवासी रघुनाथ सिंह भैसोड़ा ने बताया कि अब चुनाव देख कर डर लगता है। अब तो प्रत्याशी के लिए पैसे, दारू, मुर्गा, उपहार जरूरी हो गया है। वोटर भी इसी इंतजार में रहते हैं कि कब चुनाव आए और कब वो दावत उड़ाए। गांव का माहौल बदल जाता है। राजनीतिक दल गांव के चुनाव को बदल देते हैं। पहले पार्टी बाजी नहीं थी। पांच दस लोग टोली बनाकर गांव गांव जाते थे , ईमानदार प्रत्याशी को चुनते थे, बड़ी मुश्किल से कोई गांव का प्रधान बनने को राजी होते था। इतनी मारामारी नहीं थी। अब तो प्रधान पद के प्रत्याशी विकास के नाम पर सड़क, अस्पताल और न जाने क्या क्या वादे कर रहे हैं। इन वादों की हकीकत सब जानते हैं। निर्विरोध चुनाव की ज्यादा परंपरा थी। गांव में एकता थी गांव के पधान लोगों का प्रभाव भी था।
पहले लोगों की जुबान होती थी, सच्चाई से चुनाव होता था। शराब, पैसे का आकर्षण नहीं था। अब परिस्थितियां बदल गई हैं धन बल बढ़ गया है।

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